मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 815, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरंतु वे ही युक्तिसे समन्वित होकर दीपक-प्रज्वलनका भी काम करते हैं।
जल-अग्नि परस्पर विरोधी हैं, परंतु युक्तिसे समन्वित होकर बाष्पद्वारा यन्त्र
संचालन करते हैं । वे विरोधी अन्यरूपसे हैं, कार्यवाहक अन्यरूपसे हैं। इसीलिये
स्वरूपसे भाव, अभाव, सत्, असत्की एकता नहीं हो सकती । अन्यथा सरोवर-
कमल और गगन-कमलकी तथा मित्रातनय एव वन्ध्यातनयकी एकता भी कही
जानी चाहिये । अतः इस प्रकारके काल्पनिक विरोधके दृष्टान्तसे सत्, असत्,
भाव, अभावकी तरह उसी सम्बन्धसे उसी देशमे उसी वस्तुका भाव-अभाव
नहीं रह सकता । जैसे भूतलके उसी प्रदेशमें संयोग सम्बन्धसे उसी प्रकारके उसी
घटका भाव-अभाव-दोनो नही हो सकते । यदि यह हो सके तब तो ससारसे
विरोधमात्र ही दत्तजलाञ्जलि हो जायगा ।
उद्रजन, अम्लजन दो विरोधियोंके मिलनेसे पानी बना । उद्रजन, अम्लजन
केवल इतनेमात्रसे विरोधी नहीं होते क्योकि एक वह है जो दूसरा नहीं
है । इतना दूर क्यो जाया जाय, और सरल लौकिक दृष्टान्त लें ।
अनेक तन्तुओसे पट बनता है, तन्तुओमे भी एक वह नहीं है, जो दूसरे हैं।
एक दृष्टिसे सब परस्पर भाव एवं अभावस्वरूप हैं और उनके मिलनेसे ही पट
बनता है । पटमे तन्तुओका अन्तर्भाव हो जाता है, एक नयी वस्तु पट बन
जाती है । परंतु यह कलाबाजी अविचारित रमणीय ही है । तन्तुओको
परस्पर विरोधी कहनेकी अपेक्षा परस्पर सहयोगी कहना प्रत्यक्ष-प्रमाणके
अधिक अनुकूल है । विरोधी तो उन्हे एक दूसरेका अभावात्मक होनेसे केवल '
अपेक्षा-बुद्धिसे कहा जाता है । इसी तरह पट बननेपर तन्तुका लुप्त हो
जाना, पटरूपी नयी वस्तुका बन जाना भी अविचारित रमणीय है । विचारनेपर
अब भी तन्तुओसे भिन्न होकर पट कोई वस्तु नही है । शीतापनयनादि-अर्थ-
क्रियाकारिता विशेषरूपसे अवस्थित समुदायका गुण है। समुदाय समुदायीसे भिन्न
नहीं, एव विशेष अवस्थिति अवस्थावालोसे भिन्न नही हो सकती है । व्यष्टिवृक्षोसे
भिन्न होकर समष्टि वन नहीं है। पटसे भिन्न होकर उसकी संकुचित-प्रसारित
अवस्था भी भिन्न नहीं है । यही स्थिति उद्रजन, अम्लजनकी है, उन्हे परस्पर
विरोधी न कहकर सहयोगी कहना अधिक उपयुक्त है।
पञ्चभूत भी परस्पर विरुद्ध कहे जा सकते हैं । जलसे अग्निका निर्वाण
हो जाता है, किसी ढगसे अग्निसे जलका शोषण हो जाता है; पर साथ ही उनका
कार्य-कारणभाव भी है । तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है और तेजमे ही जलका
सहार होता है । ब्रह्मसे ही विश्वकी उत्पत्ति होती है, उसीमे उसका संहार भी
होता है । इस दृष्टिसे ब्रह्म ही विश्वका उत्पादक भी है, सहारक भी है ।
परंतु यह विरोध अपेक्षा बुद्धिकृत है । सत्, असत्का-सा विरोध नहीं है । इसी