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सर्वकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 813

अपेक्षा जल सत्, परंतु सर्वकारण, स्वप्रकाश, अखण्डबोधस्वरूप सत् सर्वदेश, काल
तथा वस्तुओंमें अव्यभिचरित होनेसे निरपेक्ष सत् है। तद्भिन्न सब वस्तु असत्
ही है। यदि सत्-असत्‌की अव्यवस्था हो तो किन्हीं भी सिद्धान्तो, मन्तव्यो अर्थात्
अनेकान्तवाद या मार्क्सवाद एव द्वन्द्ववादके सम्बन्धमें भी वही बाते लागू होगी।
-मार्क्सवाद भी एकान्ततः सत्य नही है। किसी रूपमे सत् है, अन्य रूपोमे असत्
-भी है। फिर अनिश्चित सिद्धान्तमे किसीकी प्रवृत्ति कैसे होगी ? अपेक्षा-बुद्धिसे
भाव-अभावकी एकत्र स्थिति तो भारतीय दर्शनोमे अधिक प्राचीनकालसे मान्य है—
भावान्तरमभावो हि कयाचित्त्वपेक्षया।
अर्थात् किसी अपेक्षासे दूसरा भाव ही अभाव है। जैसे घटघट-रूपसे भाव
होनेपर भी पटरूपसे अभाव भी है। इसीलिये स्वरूप-पररूपसे हरेक वस्तु सत्,
असत्, उभयात्मक है—
स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मकम्।
परंतु इतने मात्रसे सत्-असत्‌का अविरोध नही कहा जा सकता। स्वरूपसे
सत् असत् नहीं हो सकता। अन्यरूपसे सत्‌का असत् होना यह अपेक्षाबुद्धिकृत
है। नियम तभी निर्दोष होता है जब वह अव्याप्ति, अतिव्याप्ति तथा असम्भव
दोषोसे मुक्त हो। विचित्र ससारमे गुणधर्मकी विचित्रता स्वाभाविक है। केवल
कतिपय स्थलोमे सहचार-दर्शनमात्रसे व्याप्ति नही होती। पार्थिवत्व एवं
लोह लेख्यत्वका सर्वत्र सहचार होनेपर भी केवल हीरकमे अव्याप्ति होनेमात्रसे
यह व्याप्ति अशुद्ध समझी जाती है। फिर द्वन्द्वमानके तो लगभग सभी नियम
अव्याप्ति-अतिव्याप्ति दोषोसे ग्रस्त होते हैं।
कहा जाता है कि 'द्वन्द्वमान इस स्थावर आधिभौतिकताका भेदन कर जाता
है। 'मनुष्य' शब्दमे सब सम्भव मनुष्य सम्मिलित हैं। लेकिन मनुष्यजाति और
मनुष्यगण यद्यपि भिन्न और पृथक् तर्कसिद्ध श्रेणियाँ हैं, लेकिन केवल तार्किक
दृष्टिसे ही वे ऐसे हैं। एक ही घटनावलीके देखनेके लिये ये विभिन्न दृष्टिकोण हैं।
व्यापकताके दृष्टिकोणसे अर्थात् उस दृष्टिकोणसे, जिसमे एक ही मनुष्य जातिका
सदस्य होनेके नाते सब एक समान हैं। 'मनुष्यजाति' सब मनुष्योकी
समष्टि है। मनुष्यगण सब मनुष्योकी समष्टिकी ही एक और कल्पना है, लेकिन
इस अर्थमे कि कोई भी मनुष्य किसी दूसरे मनुष्यके समान नही है। द्वन्द्वमानके
लिये विशेष और व्यापक याने 'साधारण एक और सब' विरोध रहते हुए भी
ये दोनों एक दूसरेमे और एक दूसरेके द्वारा अवस्थित हैं। 'श्याम' का 'श्यामत्व'
और उसके मनुष्यत्वसे पृथक् रूपमे न रह सकता है न उसके रहनेकी कल्पना
ही की जा सकती है। मनुष्यको मनुष्यरूपमें हम उस साधारण गुणसे जानते हैं—
जो सब विशिष्ट मनुष्योमे विद्यमान है, और हर विशिष्ट मनुष्यकी पहचान तभी
हो सकती है, जब व्यापक मनुष्यरूपसे उसकी भिन्नताको दिखलाया जाय।