मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 708, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस तरह काल्पनिक सुख-स्वप्नका वर्णन करके समाजवादी धरातलमें
स्वर्गधाम उतार देनेकी बात करते हैं, परंतु वस्तुस्थिति यह है कि जगत्की
विचित्रताके साथ ही मनुष्योंमें भी विचित्रता होती है। सभी सब कामकी न सर्वाङ्गीण
शिक्षा ही प्राप्त कर सकते हैं, न सब कामके विशेषज्ञ ही हो सकते हैं और न सब
प्रमाद-आलस्यशून्य होकर शक्ति-चोर्य बिना ईमानदारीसे शक्तिभर परिश्रम ही कर
सकते हैं । यह भी नहीं हो सकता कि सब अनिवार्य आवश्यकताभर ही पदार्थ ले,
अधिकका संग्रह न करें । सभी व्यक्ति स्वतन्त्र व्यस्क, हम्बर, रोल्स मोटरकी इच्छा
कर सकते हैं, सभी प्राइवेट हवाईजहाज चाह सकते हैं । सभी फर्स्टक्लासके मकान,
फर्नीचर चाहेंगे, सभी वकील, जज या प्रधानमन्त्री होना चाहेंगे, फिर साधारण
कार्यों एव वस्तुओंसे कोई क्यों सन्तुष्ट होगा ? अगर यह दशा सम्भव है तो किसी
भी सिद्धान्तवादीको इसमें क्या आपत्ति होगी ।
आमतौरपर कोई भी ईमानदार मानवताके नाते अपने वैध सम्पत्तिसे
सन्तुष्ट रहता है । अत्यन्त ग्राम्य लोगोंका भी यही विश्वास है कि अपनी वैध कमाईमे
सूखी रोटीमें सन्तुष्ट रहना अच्छा है । दूसरोंकी वस्तुका अपहरण