मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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क्रय-शक्तिके घटने और बाजारमें माल न खपत होनेका प्रश्न ही नहीं उठेगा ।
पूँजीवादमें कल-कारखाने व्यक्तिगत होते हैं, अतः पूँजीपतिके सामने मुनाफा
कमाना ही मुख्य लक्ष्य रहता है । वह आवश्यकताभर उपयोगी वस्तु पैदा करके
कारखानोको वद नहीं रख सकता, क्योकि इससे उसका आर्थिक नुकसान होता है ।
वह बराबर कारखाना चलाकर माल पैदा करता है और दूसरे देशोके बाजारोको
माल खपतके लिये ढूँढता है । बेकार मजदूरोकी परवा भी उसे नही होती; परंतु
वेकारीसे यदि ९५ प्रतिशत मजदूरोकी क्रय-शक्ति घट जायगी तो बाजारोमे माल-
की खपत न होनेसे पूँजीवादके सामने गतिरोध अनिवार्य होगा । जब सब कारखाने
एवं उत्पादन-साधन मजदूर सरकारके हाथमें होगे, तब मुनाफा कमाना उसका
लक्ष्य ही नहीं होगा । वह तो उपयोगके लिये ही वस्तु-निर्माण करायेगी । उपयोग
वस्तु पैदा हो जानेपर कारखानोको द भी रख सकती है । उसके यहाँ
मजदूरोको अन्य उपयोगी वस्तु-निर्माणमे लगाया जा सकता है । सभी नागरिकोके
लिये अच्छी मोटर, अच्छे मकान, अच्छा भोजन, अच्छा वस्त्र आदि' उपयोगी
वस्तुओके निर्माणके लिये नये-नये कारखाने बनाये जायेंगे । उनसे सब लोगोको काम
दिया जायगा । यन्त्रोके पूर्ण विकास हो जानेपर जब फिर थोडे ही समयमें थोड़े
ही आदमियोद्वारा सब उपयोगी वस्तुओका निर्माण हो जायगा तो भी बारी-बारीसे
थोड़ा-थोड़ा काम सबसे लिया जायगा । सप्ताहमें एक दिन या मासमे एक दिन ही
सबको काम करना पडेगा । शेष समय साहित्य, विज्ञान, कला आदिके सीखनेमे
लोग लगा सकते हैं । इस तरह जो समस्या पूँजीवादमे हल नहीं हो सकती, वह
सब कम्युनिज्ममे हल हो जायगी ।'
परंतु यह ठीक नहीं है; क्योकि जहाँ भी ईमानदारीपूर्वक उत्पादन एवं -
ईमानदारीसे वितरणकी व्यवस्था होगी, वही उक्त समस्याका समाधान हो सकता
है । किसी भी अच्छे शासनका यही लक्ष्य होता है कि राष्ट्रकी जनताको योग्यता एवं
आवश्यकताके अनुसार काम, दाम, आराम मिले । किसीको काम, दाम, आरामके
अभावमे वेकारीका मुकाविला न करना पडे—यह बात कम्युनिष्ट सरकार बन
जाने मात्रसे सम्पन्न नहीं हो सकती । कम्युनिष्ट सरकार भी कोई समस्या जादूकी
छडीसे नही सुलझा सकती, किंतु काम, दाम, आरामके वितरणमें ईमानदारी लानेसे
ही समस्याओका समाधान हो सकता है । ईमानदारीके बिना वितरणमें वैषम्य,
पक्षपात होना स्वाभाविक है । कम्युनिष्टोमें भी पदाधिकारके लिये होड चलती
ही है। इसीसे जारशाही खतम होते ही क्रान्तिकारियोमे दलवन्दियों हुई और पक्षपात,
मारकाट शुरू हो गयी । ईमानदारी होनेके कारण ही धर्म-नियन्त्रित राम-राज्य या
कोई भी शासन उक्त समस्याका समाधान कर सकता है । अर्थात् किसीका वैध
स्वत्व एव अधिकार बिना छीने भी आमदनी एव उसके उपयोगपर नियन्त्रण किया