मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 697, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रमिकोंका वैधानिक सङ्घर्ष स्थिति सुधारनेके लिये पर्याप्त नहीं होता । इजारेदार
बैंकशाह वैधानिक सङ्घर्षसे प्रभावित होकर श्रमिकोंकी दशा सुधारनेके लिये
प्रस्तुत नहीं हो सकते । ( यहाँ वैधानिक विरोधका तात्पर्य है—मजदूर-सभाओ,
सहयोगसमितियो एवं संसदीय दलोंके आन्दोलनसे ) अतः मजदूरोंको क्रान्तिका
मार्ग अपनाना पडता है । क्रान्तिद्वारा पूँजीवादका अन्त करनेसे ही श्रमिकोंकी
दशा सुधर सकती है ।
“दूसरा विरोध बैंकशाहोंके विभिन्न गुटों तथा साम्राज्यवादी शक्तियोंके
बीच होता है । यह विरोध विभिन्न देशोंके पूँजीवादके असमान विकासके कारण
होता है । यूरोपमे सर्वप्रथम इंगलैंडमे औद्योगिक क्रान्ति हुई । फ्रांसने
इस क्षेत्रमे उसीका अनुसरण किया । १९ वीं सदीमे कच्चे मालके स्रोत एव
तैयार मालके खपतके लिये बाजारोंकी आवश्यकता पड़ी । तब उन्होंने दुनियामे
साम्राज्य स्थापित किया । तबतक जर्मनी भी औद्योगिक क्षेत्रमें अग्रसर हुआ ।
उसे भी साम्राज्यकी अपेक्षा हुई, किंतु साम्राज्य-स्थापनाके क्षेत्रमे इंग्लैंडका
एकाधिकार था । फलतः साम्राज्य-स्थापनामे पिछडा हुआ मध्य यूरोप
पुराने साम्राज्यवादी फ्रांस एवं इंग्लैंडको युद्धद्वारा पराजित करके ही साम्राज्यमें
हिस्सा बँटा सकता था । इसीलिये जर्मनी, इटली तथा जापानने युद्धके लिये
तैयारियाँ कीं और साम्राज्यवादी लोगोंमें भी अस्थायीरूपसे दो शिविर हो गये ।
युद्धों, महायुद्धोंद्वारा किसीका विनाश होता है, किसीका आधिपत्य होता है ।
फिर भी साम्राज्यवादी सङ्घर्षका अन्त नहीं होता, किंतु आन्तरिक विरोध हावी
रहता है । तीसरा विरोध सभ्य कहे जानेवाले साम्राज्यवादी राष्ट्रों और पराधीन
राष्ट्रोंके बीच होता है । साम्राज्यवादी निर्बल राष्ट्रोंका शोषण करते रहते हैं ।
साम्राज्यवादी शोषणको सङ्घटित करनेके लिये पराधीन देशोमे रेल-तार आदिके
कारखाने खोलते हैं । जनता इनसे मुक्त होनेकी इच्छासे इनके विरुद्ध मोर्चा
स्थापित करती है । समयकी प्रगतिसे शोषण बढता है । राष्ट्रीय सङ्घर्ष भीषण
बन जाता है । साम्राज्यवादी देशोंके भी शोषित श्रमिकोंकी सहानुभूति पराधीन
देशोंके शोषितोंके साथ होती है । बन्धु-भावसे प्रेरित होकर दोनो साम्राज्य-
वादियोंके विरुद्ध बगावत करते हैं ।”
यह हम कई बार कह चुके हैं कि घटनाएँ ससारमें भली भी होती हैं
और बुरी भी । अच्छी घटनाओंका अनुसरण उचित है, बुरी घटनाओंका
नहीं । व्यवहारके लिये विधानका ही उपयोग किया जाता है, इतिहासका
नहीं । जगद्गुरु भारतकी दृष्टिसे सम्राट् एव सार्वभौमका अभिप्राय देशके केन्द्रीय
शासन एवं विश्व-सरकारसे होता था । छोटी-छोटी शक्तियाँ परस्पर टकराकर
अपने और संसारके अकल्याणका कारण बनती हैं । इसलिये एक परम समर्थ