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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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३५६ मार्क्सवाद और रामराज्य
समुदायकी सम्मति बिना एवं मना करनेपर भी अगर किसीने प्रमादवश
धन नष्ट किया है, तो उसे सबको धन देना पड़ेगा । राजाका षष्ठांश देकर शेष
आय मूल-धनके भागानुसार सबको मिलना चाहिये । जिसने विशेषरूपसे दैवभय
या राजभयसे धनको नाश होनेसे बचाया है उसे दशांश देकर शेषका अंशानुसार
समुदायके लोग ग्रहण करे—
बहूनां सम्मतो यस्तु दद्यादेको धनं नरः।
करणं कारयेद्वापि सर्वैरेव कृतं भवेत् ॥
समवेतैस्तु यद्दत्तं प्रार्थनीयं तथैव तत्।
न याचते च यः कश्चिल्लाभात्स परिहीयते ॥
श्रूयतां कर्षकादीनां विधानमिदमुच्यते ।
वाह्यवाहकबीजाद्यैः क्षेत्रोपकरणेन च।
ये समाः स्युस्तु तैः सार्धं कृषिः कार्या विजानता ॥
( वही २२; २५—२७)
बहुतोंकी सम्मति किसी उद्योगके लिये, एक व्यक्ति जो धन देकर
उद्योग प्रारम्भ करता है, वह सभीद्वारा दिया गया समझा जाना चाहिये । जिन
संयुक्त लोगोंने जो धन दिया है सभीको मिलकर ही उसे माँगना चाहिये । जो
उनसे नही माँगता उसे लाभमें वचित रहना पड़ेगा । संयुक्तरूपसे कृषिकर्म
करनेवालोमें भी जिनका हल, बैल, मजदूर, बीज, खाद, खेत आदिका सामान
या कम, अधिक जिनके जैसे हैं, तदनुसार ही उनको लाभमे हिस्सा मिलना चाहिये ।
वाह्यबीजात्ययाद्यच्च क्षेत्रहानिः प्रजायते ।
तेनैव सा प्रदातव्या सर्वेषां कृषिजीविनाम् ॥
हेमकारादयो यत्र शिल्पं सम्भूय कुर्वते ।
कर्मानुरूपं निर्वेशं लभेरंस्ते यथांशतः ॥
शिक्षकाभिज्ञकुशला आचार्याश्चेति शिल्पिनः ।
एकद्वित्रिचतुर्भागान् लभेयुस्ते यथोत्तरम् ॥
हर्म्यं देवगृहं वापि धार्मिंकोपस्कराणि च।
सम्भूय कुर्वतां चैषां प्रमुखो द्व्यंशमर्हति ॥
नर्तकानामेष एव धर्मः सद्भीरुदाहृतः ।
तालज्ञो लभते ह्यर्धं गायनास्तु समांशिनः ॥
( वही २८, ३४-३७)
जिसके हल-बैल या बीजकी कमीसे जो खेतकी हानि हो उसीको वह हानि
सहनी पड़ेगी । हेमकार आदि शिल्पी जहाँ मिलकर काम करते हों, वहाँ कर्मानुरूप
प्रत्येकको वेतन मिलना चाहिये । शिक्षक, अभिज्ञ, कुशल आचार्यको एक, दो,
तीन तथा चार भाग क्रमेण मिलना चाहिये । प्रासाद, देव, गृह धार्मिक उपस्करण