मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलगान या नजरानाके रूपमे मालिकके पास चला जाता था । परन्तु उस समय
शोषण होता था मालिकोंके उपयोग और उपभोगके लिये । उस समय व्यवहारमें
लाना ही उनका उपयोग होता था । इसलिये शोषण भी उतना ही होता था
जितनेमे मालिकोकी आवश्यकता पूरी हो जाती थी । मालिक भी शोषणद्वारा प्राप्त
धनको अपने व्यवहारमें खर्च कर देते थे, जिससे वह धन दूसरी श्रेणियोंके पास
पहुँचकर फिर बाजारमें पहुँच जाता था और दूसरोंके उपयोगमे आता रहता
था । परन्तु पूँजीवादके युगमें धनको पूँजी बनाकर उसका उपयोग खर्चके लिये
नहीं, बल्कि अधिक धन पैदा करनेके लिये किया जाता है । उसके पैदावारके
साधन बढाये जाते हे । पूँजीपतियोंके लिये मुनाफेका क्षेत्र बढाया जाता है। मुनाफेका
बहुत छोटा भाग पूँजीपतियोंके खर्चमें आता है । शेष पूँजी बनकर मुनाफा
कमानेके ही काममें आता है । जितना जितना अधिक मुनाफा होता है, उसमें और
अधिक मुनाफा कमानेका यत्न किया जाता है । इस तरह पूँजीपतिके मुनाफा
कमानेसे सन्तुष्ट होनेकी कोई सीमा नहीं रहती ।'
वस्तुतः अङ्ग अङ्गीभाव तथा शेष-शेषी-भावसे ही सेव्य सेवक-भाव है ।
सेवक, दास आदि शब्द लगभग समानार्थ हैं । ससारमें ये भाव किसी-न-किसी
रूपमें सदा ही बने रहते हैं । भले ही कहा जाय कि आज राजा-प्रजाका भाव
मिट गया, आज प्रजा ही राजा है, सरकार या सरकारी आदमी सेवक हैं ।
फिर भी सिवा शब्दोंके व्यवहारके कोई भी अन्तर नही आया । आज केवल
वोट डालनेके समयतक भले ही कुछ अशोंतक जनताका सम्मान किया जाय,
परन्तु व्यवहारतः जिन लोगोंके हाथमें शासनयन्त्र आता है, भले ही अपना नाम
वे सेवक रखे; किंतु वे सत्ताधारी राजेका भी कान काटते हैं । वस्तुत आज
सेवको (शूद्रो) का ही राज्य है । मालिक कही जानेवाली जनता जो चाहती है,
उसीकी पूर्ण उपेक्षा की जाती है । आज भारतीय जनता गोहत्या-बन्दी चाहती है,
धर्महत्या, शास्त्रहत्याका विरोध करती है, परन्तु सेवक कहे जानेवाले सरकारी
अधिकारी उसकी कुछ भी परवा नहीं करते । कहनेके लिये आज दास या
गुलामी-प्रथा समाप्त हो गयी, परन्तु खास साम्यवादी देश रूसमें ही विरोधियोके
साथ दासो एव गुलामोसे भी अधिक बुरा व्यवहार किया जाता है । कहनेके लिये
भारतमें बेगारी-प्रथा समाप्त हो गयी, किंतु वही श्रमदानके रूपमें जोरोंसे
प्रचलित है, जिसे इच्छा न होनेपर भी करना पड़ता है। बड़े-बड़े अध्यापक,
प्रिंसिपल तथा उच्च श्रेणीके लोग इच्छा न रहनेपर भी सरकारी आज्ञानुसार
श्रमदानमें लगते ह । इतना ही नहीं, कहीं तो झूठे तौरपर ही रजिस्टरोंकी खाना
पूरी की जाती है । प्राचीनकालमें बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी अपने आपको ईश्वरका,
महापुरुषोका, भगवद्भक्तोका दास बननेमे गौरव अनुभव करते थे । धर्मराज