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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 603

शासकोंने अपनी राजनीतिका बागडोर तपःपूत, लोक-हितैषी, राग-द्वेषविहीन
ऋषियोंके ही हाथमें दे रक्खा था। देवराज इन्द्रकी राजनीति देवगुरु बृहस्पतिके
हाथमें थी, दैत्यराज बलिकी राजनीति महर्षि शुक्राचार्यके हाथमें थी तथा रामचन्द्र-
की राजनीति वसिष्ठके हाथमें थी। धर्मराज युधिष्ठिरकी राजनीति धौम्य, व्यास,
कृष्ण, विदुर आदिके हाथमें थी। चन्द्रगुप्तकी राजनीति महर्षि चाणक्यके हाथमें
थी तथा शिवाकी राजनीति भी समर्थ रामदासके हाथमें थी। वस्तुतः जैसे बिना अङ्कुशके
हस्ती, बिना लगामके घोडा आदि हानिकारक होते हैं, वैसे ही अङ्कुश एवं नियन्त्रणके
बिना शासन भी हानिकारक होता है। राज्यश्रीसम्पन्न राजापर भी अङ्कुश होना
ही चाहिये। इसी अर्थमें राजापर धर्मका नियन्त्रण होना चाहिये। यही बृहदारण्यक
'क्षत्रस्य क्षत्रम्' (१।४।१४) के अनुसार धर्मनियन्त्रित राजतन्त्रका सिद्धान्त है। धर्म-
कर्म, संस्कृति, धर्मसंस्थाकी रक्षा तभी हो सकती है, जब धर्म-नियन्त्रित शासक हो।
अन्यथा उच्छृङ्खल शासक सबको ही चौपट कर देता है।

सत्पुरुषोंसे एक निवेदन

कुछ लोग कहते हैं कि उपासना या ज्ञान तो मनकी चीज है।
सब कुछ गड़बड़ होनेपर भी महात्मा या विद्वान्को इन टंटोंसे दूर रहकर भजन
ही करना चाहिये। ठीक है, परन्तु शास्त्र एवं धर्म-स्थान नष्ट हो जानेपर विद्वानो या
महात्माओंका षण्डामर्कके तुल्य सरकारीकरण हो जानेपर भजन करनेका, धार्मिक
होनेका मन भी कैसे बन सकेगा ? आखिर धार्मिक, आध्यात्मिक भावनाओंसे ओत-
प्रोत मन भी तो शास्त्रों एवं सत्पुरुषोंकी कृपासे ही बनता है, बिना शास्त्रादिके
वैसा मन भी नही बन सकता है। यदि प्रह्लादने भी यही सोचा होता कि चलो
पितासे विवाद कौन करे ? मनमें ही रामनाम जपते रहेंगे, ऊपरसे पिताकी ही बात मान
ले तो आज कोई राम-नाम लेनेवाला रह सकता था ? परंतु जब सच्चाईके साथ
प्रह्लादने अपने जीवनको संकटमे डालकर भी सिद्धान्तकी रक्षा की, तभी संसारमें
सिद्धान्तकी स्थिरता रह सकी है। इस तरह विद्वान् एवं महात्मा राजतन्त्र शासन-
मे भी राजनीतिमें हस्तक्षेप करते थे, फिर अब तो जनतन्त्र-शासन है। इस सिद्धान्त-
के अनुसार तो शासनकी सर्वोच्चसत्ता जनतामें ही निहित होती है। अतः वास्तविक
राजा जनता ही होती है, अतः राजनीतिक दक्षता सम्पादन करना प्रत्येक व्यक्तिका
परम कर्तव्य है, फिर तो जनताके धन एवं धर्मकी रक्षाका उत्तरदायित्व जनतापर
ही होता है। इसलिये जनताके प्रत्येक व्यक्तिका कर्तव्य होता है कि वह उदारता,
गम्भीरता और दक्षताके साथ राष्ट्र एवं धर्मका हिताहित देखकर कर्तव्यका निर्धारण
एवं पालन करे। जहाँ न राजतन्त्र हो, न जनतन्त्र हो; किंतु अधिनायकतन्त्र डिक-
टेटरशिप हो, वहाँपर तो विशिष्ट दक्ष राजनीतिज्ञ विद्वानो एव महात्माओके सिवा
दूसरा कोई कुछ कर ही नहीं सकता है। जनताका संग्रह, उसे प्रोत्साहन देना एवं
क्रान्तिके लिये उसे तैयार करना भी राजनीतिज्ञोके ही वशकी बात है। ऐसे समयमें धर्म
एवं धर्मशास्त्रोंकी रक्षाके लिये विद्वानोंको सामने आना पड़ता है। इसी अभिप्रायसे
कहा गया है कि—