मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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उन्हे अन्न मिले । यथासम्भव नकद क्रय-विक्रयके स्थानपर वस्तु-विनिमय
होना चाहिये और जिसका जो परम्पराप्राप्त व्यवसाय है, उसे वही करना चाहिये ।
इस तरह परस्पर सम्बन्ध स्थापित रखनेमें सुविधा होगी । जहाँतक हो
प्रजाको विशुद्ध क्षत्रियवंशका राजा, विद्वान् ब्राह्मण पुरोहित तथा महामात्य
बनाना चाहिये । न्यायाध्यक्ष तथा अध्यापकके पदपर भी ब्राह्मणोंकी ही नियुक्ति
होनी चाहिये । सेनापतिके पदपर पवित्र वीर क्षत्रिय तथा सैनिक भी अधिक-
तर कुलीन क्षत्रिय ही होने चाहिये । कोषाध्यक्ष वैश्य तथा सेवाध्यक्ष शूद्र
होने चाहिये । चर्मके व्यापारो तथा यन्त्रोंके अध्यक्ष चर्मकार होने चाहिये ।
शुचिता (सफाई) विभागका अध्यक्ष अन्त्यज होना चाहिये । इसी तरह
प्रायः सभी यन्त्र, शिल्प, कल-कारखाने आदिपर शूद्रोंका ही प्राधान्य रहना
चाहिये । सर्वसाधारणके व्यवहारमें आनेवाली राष्ट्रकी भाषा हिंदी होनी
चाहिये । पर विशिष्ट विवरणोंमें संस्कृतका प्रयोग आवश्यक है ।
राजाको उदार, सौम्य, धार्मिक, निर्व्यसन, विद्वान्, शुद्ध तथा रहस्यज्ञ
होना चाहिये । उसे वेदान्त, न्याय तथा दण्डनीतिका विद्वान् और
अपने दोषोंका ज्ञाता होना चाहिये । कोई काम करनेके पहले उसपर उसे
स्वयं तथा मन्त्रियोंके साथ एकान्तमें अच्छी तरह विचार करना चाहिये ।
किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्यमें शुभ मुहूर्त्त, नीति और आथर्वणिक प्रयोगोंका उपयोग
किया जा सकता है। अच्छा तो यह है कि राजा योग्य व्यक्तियोंद्वारा श्रौत-स्मार्त्त-
कर्मोंका अनुष्ठान करता रहे। राजाका कर्त्तव्य है कि वह अप्राप्त धन, भूमि आदि
वस्तु धर्ममार्गसे प्राप्त करे, प्राप्तकी रक्षा करे तथा उन्हे बढाये और फिर उन्हे
पात्रोमे प्रदान भी करे । दत्त वस्तुओंका आगामी राजाओंद्वारा भी पालन
होता रहे, इसलिये दानपत्र आदिका उचित उल्लेख होना चाहिये । राज-
धानी ऐसे प्रदेशमें होनी चाहिये जो रम्य हो और जहाँ मनुष्योंके लिये अन्न
तथा पशुओके लिये चारा पर्याप्त मिल सके । वहाँ विस्तृत दुर्ग (किला)
बनवाना चाहिये, जिसमें जन, धनकी पूर्ण रक्षा हो सके । राजाको चाहिये
कि वह विद्वान् ब्राह्मणोंके प्रति क्षमाशील, शत्रुओंके प्रति क्रोधयुक्त और
भृत्यवर्ग तथा प्रजाओके प्रति पिताके समान हो । प्रजाके पुण्यका छठा भाग
राजाको मिलता है, अतः न्यायसे प्रजाका पालन ही राजाके लिये सबसे बड़ा
धर्म और दान है । अन्यायियोंसे ठीक रक्षा न कर सकनेके कारण प्रजाके
पापोंका आधा भाग राजाको मिलता है, अतः उसे सदा सावधान रहना चाहिये ।
राजनीतिके अयोग्यौँ, नास्तिकोंके हाथमें जाते ही विद्वानोंके भी मुँह बंद हो
जाते हैं । शुक्राचार्यके पुत्र षण्डामर्क-जैसे योग्य विद्वान् भी हिरण्यकशिपु-जैसोंको ही
ईश्वर बतलाने लगते हैं । वे किसी अयोग्य शासकको भी 'त्वमर्कस्त्वं सोमः' (शिवमहिम्न०)
कहने लगते हैं । शासकोसे भयभीत विद्वान् स्पष्ट सत्य कहनेमे हिचकने लगते हैं ।