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सर्वकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 585

त्रयोदश परिच्छेद
उपसंहार
भारतीय राजनीतिक दर्शन
पाश्चात्त्य देशोंमें दर्शन एवं शास्त्र शब्द बड़ा ही सस्ता बन गया है।
किसी भी विचारको, जैसे गर्भशास्त्र, प्राणिशास्त्र, मार्क्सदर्शन आदिकी वे शास्त्र
संज्ञा देते हैं। किंतु विश्वविख्यात भारतीय विद्वानोंने तो शास्त्र शब्दका प्रयोग
मुख्य रूपसे अनादि अपौरुषेय वेदमें ही किया है। उन्हींमें प्रत्यक्षानुमानसे अनधि-
गत धर्म, ब्रह्मादि तत्त्वबोधन क्षमता है--'प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुध्यते।
एनं विदन्ति वेदेन तस्माद् वेदस्य वेदता ॥', 'शास्त्रयोनित्वात्' (ब्र० सू० १।१।३)
में शास्त्र शब्दका ऋग्वेदादि अर्थ ही उक्त है। जैसे रूप आदिके सम्बन्धमें चक्षु आदि
स्वतन्त्र प्रमाण हैं, वैसे ही धर्म, ब्रह्म आदि अतीन्द्रिय-अचिन्त्य विषयोंमें स्वतन्त्ररूपसे
अपौरुषेय वेद ही प्रमाण हैं। अन्य तदाश्रित तदुपबृंहित आर्ष धर्मग्रन्थोंमें तो
प्रत्यक्षानुमानागमादि मूलकत्वेनैव प्रामाण्य है । अतएव शास्त्रत्व भी वेद-
मूलक होनेसे ही उनमें सिद्ध होता है। प्रमाण, प्रमेय, साधन फलका प्रामाणिक
निर्देश दर्शनका स्वरूप होता है। औत्सुक्यनिवृत्ति-जिज्ञासोपशान्तिमात्र पाश्चात्त्य
दर्शनोंका उद्देश्य है। तद्भिन्नपरस्पराविरोधेन धर्म, अर्थ, काम, मोक्षकी प्राप्ति एवं
अव्यभिचरित तत्साधनोंका सम्यक् ज्ञान भारतीय दर्शनोंका उद्देश्य है ।
आजकलके कुछ समालोचकोंका कहना है कि 'पाश्चात्त्य देशोंके राजनीतिक
दर्शन हैं, किंतु भारतमें कोई राजनीतिक दर्शन नहीं है। कारण, 'पाश्चात्त्य देशोंके
विद्वान् राजनीतिक एवं दार्शनिक दोनों ही थे; किंतु भारतके राजनीतिज्ञ
दार्शनिक नहीं थे ।' परंतु उनका यह कहना सर्वथा निराधार है । सबसे पहली
बात तो यह है कि सर्वदर्शनोंका शिरोमणि वेदान्त है। वेदोंमें वेदान्त भी है,
राजनीति भी है। मनु, याज्ञवल्क्यादि धर्मशास्त्रोंमें दर्शन भी है, राजनीति भी
है। व्यास सबसे बड़े दार्शनिक और सबसे बड़े राजनीतिज्ञ हैं । वेदान्तदर्शनके
रचयिता व्यास ही महाभारतके रचयिता हैं । महाभारतका मोक्षधर्म, गीताका दर्शन
और शान्तिपर्वका राजधर्म पढ़े तो उक्त मत सर्वथा निर्मूल सिद्ध हो जायगा । बृहस्पति,
कणिक, कौटल्य, कामन्दक आदि सभी राजनीतिक दार्शनिक थे । योगवासिष्ठके
वशिष्ठ महादार्शनिक एवं महाराजनीतिज्ञ थे । सूर्यवंशकी राजनीतिके वे ही
कर्णधार थे । वस्तुस्थिति यह है कि पदवाक्यप्रमाणपारावारीण विद्वान् शब्द-शुद्धि
आदिका कार्य पाणिन्यादि व्याकरणसे चलाते हैं, वाक्यार्थ निर्णयके लिये पूर्वोत्तर-
मीमांसाका उपयोग करते हैं, अनुमान आदिके सम्बन्धमें न्याय वैशेषिकका उपयोग
करते हैं तथा वे ही तत्त्व-संख्यान, चित्त-निरोध आदिमें सांख्य एवं योगका उपयोग
कर लेते हैं। वे अगतार्थ अपूर्व वस्तुका ही प्रतिपादन करते हैं। पाश्चात्त्य लोग
गतार्थ वस्तुओंका भी निरूपण करके स्वतन्त्र दार्शनिक बननेकी चेष्टा करते हैं ।