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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 519

७६० मार्क्सवाद और रामराज्य
है। यह भी न प्रमाणगम्य है, न किसी जानकारको इसका अनुभव है। अर्थात्
शिलाघनमध्यस्थ सहस्र दीप प्रकाश प्रमाणागम्य तथा ज्ञातुरहित होनेसे अमान्य
होता है वैसे ही विज्ञान प्रमाणागम्य तथा ज्ञातृशून्य होनेसे अमान्य ही होगा। यदि
विज्ञान किसी ज्ञाताको भासमान नहीं हो तो उस स्वप्रकाशका विज्ञानसे क्या
प्रयोजन है ?
बौद्धोंकी ओरसे कहा जाता है कि "विज्ञान ही ज्ञाता है। विज्ञानवादी बौद्धो-
का विज्ञान अनुभवरूप ही है। वही साक्षी भी है"। किन्तु यह कथन संगत नहीं है
क्योंकि जैसे नेत्ररूपी साधनसे युक्त अन्य ज्ञाताको ही प्रदीपादिका प्रकाश होता है वैसे
अन्य ज्ञाताको ही विज्ञानका प्रकाश होना युक्त है। जैसे दीप ग्राह्य है। वैसे ही बौद्ध
मतमें विज्ञान भी ग्राह्य है। फिर भी बौद्धका कहना है कि जब वेदान्ती साक्षीको
स्वयं सिद्ध मानता है तो स्वयंसिद्ध विज्ञान माननेमें क्या आपत्ति है ?
वस्तुस्थिति यह है कि बौद्धके स्वयंसिद्ध विज्ञानक ही वेदान्तीने साक्षी नाम
दे दिया है तथा च नाममें ही विप्रतिपत्ति है, परंतु यह ठीक नहीं है। क्योंकि बौद्ध
विज्ञानकी उत्पत्ति और प्रध्वंस मानता है, तथा विज्ञानकी अनेकता मानता है और
वेदान्तीका साक्षी नित्य तथा एक, असङ्ग एवं अनन्त है।
बौद्धका विज्ञान बुद्धिवृत्तिरूप ही है। उसकी उत्पत्ति, विनाश तथा अनेकता
प्रसिद्ध ही है। घटादिके तुल्य ही उसकी अतिरिक्त साक्षिवेद्यता सिद्ध की जा चुकी
है। जिस विज्ञानकी उत्पत्ति होती है वह स्वयं फलरूप है, फिर स्वयं ज्ञाता कैसे बन
सकता है ? वही कर्त्ता, वही फल नहीं हो सकता है, वही पक्तां वही पाक नहीं
होता, यह कहा जा चुका है। आजकल भी बौद्ध यही कहते हैं कि 'विज्ञानवादीका
विज्ञान नित्य विज्ञानात्मक आत्मा ही है, और 'श्रीशङ्कराचार्यके समयमें भी कुछ
बौद्धोने ऐसा कहा था। किंतु यह सब बौद्धोका अपसिद्धान्त ही है।
जो कहा गया था कि स्वप्नादि प्रत्ययके तुल्य ही जागरित घटादि प्रत्यय भी
बाह्यार्थके बिना ही उपपन्न हो जायेंगे, वह भी ठीक नहीं। क्योंकि स्वप्नादि
प्रत्ययोंका जागरित प्रत्ययसे महान् अन्तर है। स्वप्नादिका बाध होता है परंतु
जागरित प्रत्ययका बाध नहीं होता। बौद्ध मतानुसार जागरित प्रपञ्च किसी अधिष्ठान-
के अज्ञानका कार्य नहीं है जो कि अधिष्ठान ज्ञानसे शुक्ति रजतके समान बाधित
हो जाय। स्वप्नकी वस्तु प्रबोध होते ही बाधित हो जाती है। इसलिये जागनेपर
प्रतिबुद्ध प्राणी कहता है 'मैने स्वप्नमें मिथ्या ही गज-रथादि देखा था। वस्तुतः
गजरथादि न थे। मेरा मन निद्रासे म्लान था। उसीसे ऐसी भ्रान्ति हुई थी।'
इसी तरह माया प्रत्ययका भी बाध होता है। यदि जागरित प्रत्यय भी बाधित हो
तो वह स्वप्न प्रत्ययका बाधक नहीं हो सकता। क्योंकि जो स्वयं बाध्य है वह बाधक
कैसे हो जायगा ? फिर तो स्वप्न प्रत्यय दृष्टान्त भी नहीं सिद्ध होगा। अतः स्वप्न
प्रत्ययके दृष्टान्तसे जाग्रत् प्रत्ययकी निरालम्बनता नहीं सिद्ध की जा सकती है।