मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबौद्ध अविद्यादिनिरोधको प्रतिसंख्यानिरोध मानते हैं, इस सम्बन्धमें प्रश्न
होता है कि यह निरोध साधनसहित सम्यग्ज्ञानसे होता है या स्वतः। यदि प्रथम पक्ष
मान्य है तो निर्हेतुक विनाश स्वीकारका सिद्धान्त खण्डित हो जाता है। यदि निरोध
स्वतः माने तो क्षणिक नैरात्म्यादि भावनादिरूप मार्गोपदेश, धर्मदर्शनादि प्रवर्तन,
साधनाभ्यासादि व्यर्थ ही होंगे।
इसी तरह आकाशको भी निरुपाख्य नहीं कहा जा सकता। वेदादिशास्त्रोंसे
आकाशकी उत्पत्ति और वस्तुत्व ज्ञात होता है। शब्दगुणके द्वारा उसका अनुमान
भी हो सकता है। जैसे गन्धादिगुण पृथिवी आदिके आश्रित रहते हैं वैसे ही
शब्द आकाशके।
'शब्द गुण है जातिमान् होकर स्पर्शरहित होकर बाह्य एक इन्द्रियसे ग्राह्य
होनेके कारण गन्धके समान' इस अनुमानके आधारपर सिद्ध होता है कि शब्द
गुण है। सामान्यविशेषतया समवायमे शब्दका अन्तर्भाव नही है, क्योकि
वे जातिहीन होते हैं। किंतु शब्दके शब्दत्व जाति होनेसे वह जातिमान् है।
हेतुका वायुमे व्यभिचार नहीं है। वायु स्पर्शवान् है और यह स्पर्शरहित है। हेतुका
दिक्काल आदिसे व्यभिचार नही है, क्योकि वह इन्द्रियग्राह्य नहीं है। इन्द्रियग्राह्य
द्रव्यमें व्यभिचार नहीं है क्योकि हेतुमें एकेन्द्रियग्राह्यत्व विशेषण है, ऐसा हेतु
शब्दमे ही है। इन्द्रियग्राह्य द्रव्यमें नहीं, गन्धत्वजातिमे भी व्यभिचार नही है, यतः
यह जातिमान् है और गन्धत्वादि जातिहीन है।
गुणत्वसिद्धिके बाद यह भी विचार ठीक है कि शब्द किस द्रव्यका गुण
है। वह आत्माका गुण नहीं हो सकता। कारण बाह्येन्द्रिय ग्राह्य है। आत्मगुण
इच्छादि बाह्येन्द्रिय ग्राह्य नहीं होते। वह मनका भी गुण नही है, क्योकि मनके
भी गुण प्रत्यक्ष नहीं होते। यद्यपि वेदान्तमतमें सुखादि मनके ही गुण होते हैं
तथापि वे साक्षिग्राह्य हैं इन्द्रियग्राह्य नहीं। शब्द पृथिव्यादिका भी गुण नहीं है।
क्योंकि गन्धादिके साथ शब्दका नियत साहचर्य उपलब्ध नहीं होता।
गन्धादिके समान असाधारण इन्द्रियग्राह्य शब्दगुण जिस द्रव्यके आश्रित है
वह पञ्चमभूत आकाश ही मान्य होना चाहिये।
बौद्ध कहते हैं कि आवरणाभाव आकाश है। परंतु उनका यह कथन ठीक
नहीं। एक पक्षीके भी उड़ते समय आवरण हो ही जायगा फिर उड़नेकी इच्छा रखने-
वाले दूसरे पक्षीको अवकाश नहीं होना चाहिये। यदि कहा जाय कि जहाँ आवरण
नहीं होगा वहाँ दूसरा पक्षी उड़ेगा ? तो यह भी ठीक नहीं, यतः आवरणाभावको
जिससे विशेषित किया जायगा वह वस्तुभूत ही रहेगा। अतः आवरणाभावमात्र
आवश्यक नहीं।
सार यह है कि निषेध्यके निषेधाधिकरणका निरूपण किये बिना निषेधका