मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 403, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्थ है, उसकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? अतः इदंवृत्तिके अनन्तर तज्जन्य
तदभिव्यक्त साक्षीमें ही रजतका अध्यास होता है. इसलिये साक्षीमे ही रजतका
भान होता है । रजतमे चाक्षुषत्वका अनुभव इसलिये होता है कि स्वभासक चैतन्य-
व्यञ्जक इदंवृत्तिका चक्षु जनक है, अतः परम्परासे चक्षुर्जन्य होनेके कारण चाक्षु-
षत्वका अनुभव होता है ।
इस पक्षमे अन्य लोग यह दोष देते हे कि 'इस तरह तो पीत शङ्ख-
भ्रममें चक्षुकी अपेक्षा न होनी चाहिये; क्योकि रूपके बिना केवल शङ्ख चक्षुसे
ग्राह्य हो नही सकता । पीतिमा ग्रहणके लिये भी चक्षु अनावश्यक है, क्योकि
साक्षिभास्यत्व-पक्षमें आरोप्य ऐन्द्रियक मान्य नहीं होता ।' यह भी नहीं कहा
जा सकता कि 'पीतिमाका स्वरूपाध्यास नहीं होता, अपितु नयनगत पित्तकी
पीतिमा ही अनुभूयमान होती है। उसका केवल शङ्ख-संसर्ग ही अध्यस्त होता
है, इसलिये उसी पीतिमाके अनुभवार्थ चक्षुकी अपेक्षा होती है ।' कारण इस
[