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सर्वकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 401

६४२ मार्क्सवाद और रामराज्य
अध्यासोमे ही अभिव्यक्त अधिष्ठान प्रकाश हेतु है' तो भी ठीक नहीं है, क्योंकि
फिर भी ‘पीतः शङ्खः’ इत्यादि स्थलोंमें दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगको हेतु कहना ही पड़ेगा।
ऐसी स्थितिमे प्रातिभासिक अध्यासोमें दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगको ही हेतु क्यों न माना
जाय ? इसीसे रजताध्यासके कादाचित्कत्वका भी निर्वाह हो जाता है। इसलिये
यह नही कहा जा सकता कि सामान्यतया एवं विशेषतया अधिष्ठान प्रकाश
अध्यासका कारण है। फिर भी शङ्का होती है कि 'सादृश्यनिरपेक्ष अध्यासोंमें
अधिष्ठान-प्रकाश हेतु न भी हो, तो भी सादृश्यसापेक्ष रजतादि अध्यासमें रजतादि
सादृश्यभूत भास्वररूप विशेषादिविशिष्ट धर्मिज्ञानको कारण मानना चाहिये।
यदि दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगमात्रको अध्यासमें कारण कहा जाय तब तो शुक्तिके तुल्य
ही इंगाल (कोयला) में भी रजतादिका अध्यास होना चाहिये।' कुछ लोगोंका
कहना है कि 'सादृश्य भी विषयदोषरूपसे ही अध्यासमें कारण है।" परंतु
यह ठीक नहीं; क्योकि वि-सदृशमें सादृश्यभ्रमसे भी अध्यास होता है, जैसे कि
समुद्रजलमें दूरसे नील शिलातलका अध्यारोप होता है। कुछ लोग सादृश्य-ज्ञान-
सामग्रीको ही अध्यासका कारण कहते हैं; परंतु ज्ञान-सामग्री ज्ञानका कारण हो
सकती है, अर्थका कारण नहीं । अतः लाघवात् सादृश्य-ज्ञान ही अध्यासका कारण है।
कुछ लोग कहते हैं कि 'जैसे स्वतः शुभ्र रजतपात्रगत स्वच्छ जलमें ही
नैल्याध्यास होता है, मुक्ताफलमे नैल्याध्यास नही होता, वैसे ही शुक्तिमें ही रजता-
ध्यास होता है, इंगालादिमे नही । यह फल-बल-कल्प्य स्वभावभावविशेष ही
व्यवस्थाका कारण है। सादृश्यज्ञानका होना-न-होना हेतु नहीं है।' परंतु यह
कहना ठीक नहीं, क्योकि स्वतः पटखण्डमें कमल-कुड्मल आदिका अध्यास यद्यपि
नही होता तथापि कर्त्तनादिके द्वारा कमलाकार सम्पन्न होनेपर उसी कर्त्तनादिद्वारा
कमलाकारघटित पटखण्डमें कमलका अध्यास देखा जाता है। यहाँ वस्तुस्वभावान-
पेक्षसादृश्यज्ञान ही अन्वयव्यतिरेकसे अध्यासका हेतु निश्चित होता है। अन्यथा
कमलाकाररहित पटखण्डमें भी कमलका भ्रम होना चाहिये। इसपर भी कुछ
लोग कहते हैं कि 'सादृश्य-ज्ञानको यदि अध्यासमें कारण माना जाय तो भी
विशेष दर्शनप्रतिवध्य रजतादि अध्यासोंमें ही उसे कारण मानना ठीक है।'
‘पीतः शङ्खः’ इत्यादि विशेष दर्शनसे अप्रतिबध्य स्थलोसे सादृश्यज्ञान सम्भव ही
नहीं है। विशेष दर्शनसे प्रतिवध्य शुक्ति रजतादि स्थलोंमें प्रतिबन्धक ज्ञान-सामग्रीको
प्रतिबन्धक माननेका नियम है। इस दृष्टिसे विशेष दर्शन-सामग्रीको अवश्य प्रति-
बन्धक कहना पड़ेगा। इसीसे सब व्यवस्था बन सकती है। फिर सादृश्य-ज्ञानको
अध्यासका कारण क्यो माना जाय ? इंगालादिके चक्षुःसम्प्रयुक्त होनेपर उसमें
नैल्यादिरूप विशेष दर्शन-सामग्री होनेसे रजतादि अध्यास नही होता। शुक्ति आदिमें
भी यदि नीलपृष्ठत्वादिके साथ चक्षुःसम्प्रयोग होता है तो विशेष दर्शन-सामग्री
होनेसे रजताध्यास नही होता। सदृशभागमात्रका सम्प्रयोग होनेसे विशेष दर्शन-