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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 4, कुल 866 में से

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पृष्ठ 4

प्रस्तावना
अखिल भारतीय रामराज्यपरिषद्, हिन्दूमहासभा, जनसंघ आदि
राजनीतिक दलोंद्वारा १९५३ में जम्मू-कश्मीर-आन्दोलन चलाया
गया। उसी सम्बन्धमें श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज दिल्लीमें गिरफ्तार
हुए और वहाँकी जेलमें नजरबंद कर दिये गये। वहाँ उन्होंने, जो
भी कम्युनिस्ट-साहित्य उपलब्ध हो सका, उसे अच्छी तरह पढ़ा
और फिर संस्कृतमें उसपर एक लंबा लेख लिखना आरम्भ किया।
वह लेख पूरा न हो पाया और वे जेलसे छोड़ दिये गये। अनेकों
कार्योंमें व्यस्त होनेके कारण वह लेख अधूरा ही पड़ा रह गया।
बादमें यह विचार हुआ कि यदि संस्कृत लेखका हिंदी-
अनुवाद कर दिया जाय और हिंदीमें उसे आगे बढ़ाया जाय तो
उससे अधिक लोग लाभ उठा सकेंगे। बम्बईके उत्साही युवक
विद्वान् श्रीवासुदेव व्यासने, जो श्रीमहाराजजीके अनन्य भक्त हैं,
संस्कृतके लेखका बड़े परिश्रमसे हिंदीमें अनुवाद किया; किंतु
निरन्तर यात्रापर रहनेके कारण वह लेख आगे न बढ़ सका।
फरवरी १९५४ में प्रयाग कुम्भसे लौटनेपर काशीमें श्रीविश्वनाथ-
मन्दिर-सत्याग्रहके सम्बन्धसे वे फिर गिरफ्तार कर लिये गये और
उन्हें जिला जेलमें रखा गया। वहाँ उस लेखको आगे बढ़ानेका
प्रयत्न फिर आरम्भ हुआ। कम्युनिस्ट साहित्यकी कई पुस्तकें
जेलमें पहुँचायी गयीं। जेल अधिकारियोंने बहुत-सी सुविधाएँ दे
रखी थीं। दिनभर दर्शनार्थियोंका ताँता लगा रहता था। जेलमें भी
अधिक अवकाश न मिलता था, पर तब भी लेखमें कुछ प्रगति
हुई। महीनेभर बाद प्रयाग उच्चन्यायालयने उनकी गिरफ्तारी अवैध
बतलाते हुए उन्हें छोड़ देनेकी आज्ञा दी, पर साथ ही यह लिखा
कि 'उत्तरप्रदेशीय सामाजिक अयोग्यता-निवारण कानून' के अन्त-
र्गत उनपर मुकदमा चलता रहे। जेलसे निकलते ही यात्रा-क्रम
फिर चल पड़ा और लेखका कार्य रुक गया। उसी वर्ष श्रीचरणों-
का चातुर्मास्य 'श्रीधर्मसंघ शिक्षामण्डल' दुर्गाकुण्ड, काशीमें हुआ।
चातुर्मास्यमें यात्रा स्थगित होनेसे कुछ अवकाश मिलता है, अतः
लेखन-कार्य कुछ आगे बढ़ा। उन्हीं दिनों 'सिद्धान्त'का जो पहले
'साप्ताहिक' था और तीन वर्षोंसे बंद था, 'पाक्षिक' रूपमें पुनः
प्रकाशन आरम्भ हुआ। वह लेख उसीमें क्रमशः प्रकाशित होने