सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 302

वर्ग-संघर्ष २८७
अनुगत प्रतीतिका विषय ही ब्राह्मणत्वादि जाति है। फिर भी यहाँ जो शङ्का की
जाती है कि वृक्षत्वजातिका ज्ञान यदि प्रत्यक्ष माना जाय तब तो उसमें शब्दरूपी
सहकारीकी कोई आवश्यकता ही नहीं रहती, वह तो इन्द्रियसे ही हो सकता है,
पर ब्राह्मणत्वके कोई भी संस्थान व्यञ्जक नहीं है। तब वृक्षत्वके समान ब्राह्मणत्वको
प्रत्यक्षसिद्ध कैसे माना जाय ? पर इसका समाधान स्पष्ट है—'सब जातियोंके
समान व्यञ्जककी आवश्यकता नहीं होती। वृक्षत्वमें शाखापत्रादि संस्थान व्यञ्जक
हैं। सुवर्णत्व जातिके प्रत्यक्षमें रूप व्यञ्जक है। इसी प्रकार ब्राह्मणत्व जातिके
प्रत्यक्षमें माता-पिताकी जातिका ज्ञान व्यञ्जक है। जिस प्रकार गान्धर्ववेदके ज्ञाता
स्वरोंकी जातियाँ, जौहरी रत्नोंकी जातियाँ पहचान लेते हैं, दूसरे लोग कुछ नहीं
जान पाते, इसी प्रकार निपुण लोग ब्राह्मणत्वादिको जान लेते हैं। नारदादिकोंने
वाल्मीकिको मिनटोंमें ब्राह्मण जान लिया था। सत्यकाम जाबालके ब्राह्मणत्वको
उसके आचार्यने जान लिया था।
कहा जाता है कि 'आजकल विशुद्ध रक्तका अभिमान केवल दम्भहै, क्योंकि
कोई भी जाति अछूती नहीं बची है। सबका किसी-न-किसी रूपमें मिश्रण हुआ है।
रंग-रूपमें भेद ही मिश्रणका प्रमाण है। जैसे काली मुर्ग़ी और श्वेत मुर्गेसे उत्पन्न
चार बच्चोंमें एक काला और एक श्वेत है, बाकी दो मिश्रित हैं। दूसरी पीढ़ीमें
सोलह बच्चोंमें एक श्वेत, एक काला और चौदह मिश्र रंगके तथा तीसरी पीढ़ीमें
चौंसठमें एक काला और एक श्वेत, बाकी सब मिश्र रंगके होते हैं, वैसे ही
मनुष्योंमें भी पश्चिमी श्वेत और पीत मंगोलका मिश्रण होनेसे कुछ पश्चिमीय रंगके
कुछ मंगोल रंगके होते हैं; पर अधिकांश पारसी, ईरानी ढंगके होते हैं। अतः
पारसी जाति इन्हीं दोनोंका मिश्रण है। यही स्थिति उत्तर भारतकी उच्च जातियोंमें
है। वहाँ मिश्रण स्पष्ट है।'
पर यह कहना भूल है। कलमी आमोंमें कभी भी मूल आमके समान फल
नहीं होते, तो क्या इतनेसे ही वह आम किसी दूसरे आमका बीज मान लिया जाय ?
जैसे काली, श्वेत मुर्गीमें भी जाति वही रहती है, नील, श्वेत, लाल, सब रंगोंकी
गायोंमें गोत्व और पुच्छत्व रहता है, वैसे ही पञ्जाबी, मैथिल, बंगाली, द्रविड़,
उत्कल, तेलंग ब्राह्मणोंके रूप-रंगमें भेद होनेपर भी ब्राह्मणत्व समान रहता है।
कभी काले माता-पितासे भी गोरे बच्चे पैदा हो जाते हैं। कभी तो किसी पशुकी
आकृतिका बच्चा पैदा हो जाता है। तब क्या उसका पशुके साथ सम्बन्ध माना
जाय ? आर्योंमें स्त्रियाँ अत्यन्त सुरक्षित रहती हैं। यहाँ अनादिकालसे वेदादिशास्त्रोंके
अनुसार स्त्रियाँ परतन्त्र रहती हैं, पातिव्रत्य पालन करती हैं। अतः यहाँ माता-पिताका
सम्बन्ध ज्ञान और तदधीन ब्राह्मणत्वादिका प्रत्यक्ष ज्ञान सुलभ है। यही आर्योंकी
विशेषता है, जो अन्यत्र बहुत कम मिलेगी। आज मोहवश उसे ही खो देनेके
लिये कुशिक्षाके प्रभावसे प्रभावित भारतीय भी व्यग्र हो रहे हैं।