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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 17

४ मार्क्सवाद और रामराज्य
का कर्मके साथ असाधारण सम्बन्ध है। मोक्ष या भगवत्प्राप्ति संसारका चरम
लक्ष्य है। वस्तुतः इन सभी विषयोंका विवेचन 'दर्शन' में आ जाता है।
यूनानी-दर्शन
पाश्चात्त्य-दर्शन प्रायः मनतक ही पहुँचते हैं। आत्मवादी भी मन और
आत्माका अभेद मानते हैं। इस सृष्टिके पहलेकी सृष्टियोंका विचार भी उन लोगां-
ने नहीं किया। 'मैट्टर' या भूतसमुदाय यद्यपि बहुत सूक्ष्म माना जाता है, तथापि
वह सांख्यीय प्रकृतिसे भिन्न है। यही कारण है कि आत्माका विचार उनके लिये
बहुत दूरकी बात हो गयी है। यूनानके दर्शन अति प्राचीन समझे जाते हैं, पर
वहाँके प्राचीन दार्शनिकोंने जड़-चेतनका भेद ही नहीं माना। किस प्रथम द्रव्य-
से संसारकी उत्पत्ति हुई, यही उनका विचारणीय विषय था। अन्नसे मनुष्यादि
प्राणियोंकी, मिट्टीसे अन्नकी, जल जमते-जमते मिट्टीकी और गर्मीसे जलकी उत्पत्ति
उन्होंने मानी है। जीव-शक्ति भी उसीमें मिली थी। फिर कुछ लोगोंने परमाणु,
कुछने विद्युत्कण और कुछ लोगोंने बानवे तत्त्व माने। अन्तमें मैटर या अव्यक्त
एक द्रव्यसे संसारकी उत्पत्ति मानी।
यूनानमें ईसवी सन्‌से ६०० वर्ष पूर्व थैलीज, एनैक्सीमैन्डर और एनैक्सि-
मेनीज—ये तीन दार्शनिक हुए हैं। हिप्पो और डायोजिनीज भी इन्हींके अनुयायी
थे। ये लोग चेतन-अचेतन-मिश्रित मूल कारण द्रव्य समझते थे। अतएव आत्मा
या ईश्वर आदिके सम्बन्धमें इन लोगोंने कोई चर्चा नहीं की। यद्यपि सृष्टिके
पहले अतिसूक्ष्म दृश्य एवं दृक् दोनों अविकल्पित होकर एकमेव-से थे—
'आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थ एकमैवाविकल्पितम्' (श्रीमद्भा० ११।२४।३)
अर्थात् ज्ञान और अर्थ दोनों ही अविकल्पित होकर एक ही प्रतीत होते
थे, तथापि यह अविकल्पकता, एकता, सूक्ष्मताके कारण प्रतीत होती है,
अविवेकके कारण नहीं, किंतु थैलीज आदि तो जीव-शक्ति-मिश्रित ही मूल
कारण मानते थे। थैलीज जलसे, एनैक्सीमैन्डर किसी अनियत द्रव्यसे और
एनैक्सिमैनीज वायुसे ही विश्वकी सृष्टि मानता था। कहा जाता है कि थैलीज
ज्योतिषी था। उसने ५८५ ई० में जो सूर्य-ग्रहण हुआ था, उसे पहले ही बतला
रक्खा था। उसके मतानुसार 'जल ही दृढ़ता, द्रवता तथा वायुके रूपमें
परिवर्तित होता है। जलसे वनस्पति तथा सभी जीवोंको जीवन मिलता है।'
किसी दृष्टिमें यह मान्यता भारतीयोंमें भी थी। मनुने लिखा है कि परमेश्वरने
पहले जल ही रचा और उसमें अपनी शक्तिका निक्षेप किया—
'अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ।' (१।८)
उसमें निवासके कारण ही ईश्वरको 'नारायण' कहा जाता है।