मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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मार्क्सवाद और रामराज्य
प्रथम परिच्छेद
पाश्चात्त्य-दर्शन
मार्क्सवाद समझनेके लिये उसकी पृष्ठभूमिपर एक दृष्टि डालना बहुत
आवश्यक है । मार्क्सवादमें दर्शन, राजनीति और अर्थशास्त्र तीनोंका ही समावेश
है । किसी भी धर्म, सम्प्रदाय, मत या वादका स्थायी आधार उसका दर्शन ही
होता है । मार्क्सने भी अपनी विचारधाराका आधार दर्शन ही बनाया । भूत,
वर्तमान और भविष्यको एक दूसरेसे पृथक् नहीं किया जा सकता । यूरोपमें
प्राचीनकालसे जो विचारधाराएँ चलती रहीं, उन्हींके विवेचनसे मार्क्सने अपने नये
सिद्धान्त स्थिर किये । अतः यह बहुत आवश्यक है कि उन विचारधाराओंको भी
पहले समझ लिया जाय । आरम्भमें ही यह प्रश्न उठता है कि दर्शन क्या है ?
इसलिये पहले हम इसीपर विचार करेंगे ।
दर्शनकी परिभाषा
यूनानी 'फिलासफस' शब्द ज्ञान और प्रेमके अर्थमें प्रयुक्त होता था । उसीके
आधारपर अंग्रेजीका 'फिलासफी' शब्द प्रचलित हुआ । यद्यपि सविस्तर मीमांसा
या विवेचना ही इसका अर्थ है, फिर भी विषय-विशेषके संक्षिप्त विचार-दर्शनके
लिये भी 'फिलासफी' शब्द व्यवहृत होता है । आजकल तो दर्शनकी एक-एक
शाखाके लिये भी 'फिलासफी' शब्दका प्रयोग होता है । कई आधुनिक पाश्चात्त्य
विद्वान् विशेषकर कम्युनिस्ट, जीवनके दृष्टिकोणको ही दर्शन मानते हैं । उनके
मतमें 'दर्शन' युगधाराका परिचायक होता है । युगसंघर्षसे ही उसका जन्म हुआ
है । दर्शनका उसके निर्माताओंके जीवनकी घटनाओंसे भी सम्बन्ध होता है ।
अफलातून ( प्लेटो ) राजकुलमें शिक्षक था, इसलिये उसके दर्शनमें राजसम्बन्धका
असाधारण प्रभाव है । हेराक्लिटिस दलितवर्गमें पैदा हुआ, इसलिये उसका दर्शन
परिवर्तनप्रवर्तक हो गया; क्योंकि दलित करनेवाली दूसरी श्रेणीका परिवर्तन
आवश्यक था । हेल्मूसियस मध्यम श्रेणीका प्रतिनिधि था और कार्लमार्क्स उदीयमान
श्रमिकोंका, इसलिये उन-उनके अनुसार उनके दर्शन भी बने । असाधारण विप्लव
कालमें मार्क्सका जन्म हुआ । फलतः उसका जीवन क्रान्तिकारी रहा और वैसा
ही उसका दर्शन भी ।१
मा० रा० १--