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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 866 में से

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पृष्ठ 106

है । अनियन्त्रित जनश्रेष्ठ अनियन्त्रित यन्त्रके समान ही भीषण हो सकता है, यद्यपि
आधुनिक विवेचक इसे एक प्रगतिशील कदम मानते हैं और समय-समयपर एक-
सत्तावादी मीमांसाने अनिश्चितता दूर की है। दैवी नियम, नैसर्गिक नियम, राज्य-
नियम या लौकिक नियम, इन नियमोंमें कौन नियम सर्वोच्चरूपसे मान्य हों,
इस विप्रतिपत्तिमे हाब्सने 'दीर्घकाय' का, रूसोने 'सामान्येच्छा' का, आस्टिनने
'जनश्रेष्ठका' अनुसरण ही ठीक बताया । एकसत्तावादी मीमांसाने राज्यको ही
एकमात्र 'नियम-विधायिका' संस्था माना । कितनी भी अच्छी व्यवस्था क्यों न
हो, जबतक उसके योग्य संचालक नहीं मिलते, तबतक वह व्यर्थ ही सिद्ध होती
है । धर्मनियन्त्रित शासनतन्त्र हो या नैसर्गिक नियमतन्त्र, निरपेक्ष दीर्घकाय
सामान्येच्छातन्त्र हो या आधुनिक जनतन्त्र, योग्य संचालकके बिना सर्वत्र ही
त्रुटियाँ आती हैं । आधुनिक जनतन्त्रकी दरिद्रता, भ्रष्टाचार, बेकारी किसीसे छिपी
नहीं है। लोकतन्त्र-निर्वाचनमे कितना भ्रष्टाचार और कितना धन-जन-शक्तिका क्षय
होता है, यह भी स्पष्ट है । वीनोग्राडोफके अनुसार भी एकसत्तावादी मीमांसा
अपूर्ण ठहरती है । अपर्याप्त इसलिये कि यह 'संघात्मक राज्य' पर लागू नहीं हो
सकती । एकात्मक राज्यमे भी राजसत्ताधारीका पता लगाना कठिन हो जाता है ।
अपूर्ण इसलिये कि राज्यका कार्य केवल आज्ञा देना ही नहीं, किंतु समन्वय भी है,
नागरिकके सामने कर्तव्य-पालन ही नही, किंतु अधिकारोंकी सुरक्षा भी है ।
न्यायालयोके निर्णयों एव लौकिक नियमोसे असम्बद्ध तथा अन्ताराष्ट्रिय नियमोपर
लागू न होनेसे भी यह अपर्याप्त एव अपूर्ण है । जनतन्त्रमे वह सुप्त-
सत्ताधारी होनेमात्रसे सतुष्ट नहीं, किंतु सक्रियसत्ताकी प्राप्ति चाहती है । यहाँ
निश्चित जनश्रेष्ठको ही वह सब कुछ नहीं मान सकती । अमेरिका आदिकी
संघात्मक शासन-प्रणालीके भी यह विरुद्ध है ।
एकात्मक सविधानमें केन्द्रियकरण होता है । ब्रिटेन एव फ्रांसमें
यह व्यवस्था थी और है । वहाँ सभी अधिकार एक संस्था---प्रतिनिधि संस्थामे
निहित होते है । ऐसी संस्थाको 'दीर्घकाय' या 'जनश्रेष्ठ' कहा जा सकता है ।
परंतु अमेरिकाके 'सङ्घात्मक' विधानमें राज्यके वैधानिक अधिकार केन्द्रिय
सरकार एव उपराज्योमे विभक्त होते है, क्योकि वहाँ शक्ति-विभाजनका
सिद्धान्त स्वीकृत है । कई अन्य देशोने भी इस व्यवस्थाको अपनाया है, इस ढंगके
सविधानोमें कोई ऐसी संस्था नहीं है, जिसमें राज्यके सब अधिकार निहित हों ।
एकात्मक राज्यमें भी निश्चित जनश्रेष्ठका पता लगाना कठिन होता है। आस्टिनने
ही तत्काल ब्रिटेनमे राजा, लार्डों और निर्वाचकोको सत्ताधारी बतलाया था । परंतु
दूसरी बार उसने राजा, लार्ड और लोकसभा मे राजसत्ताका निहित होना बताया ।
दोनो ही स्थितिमे राजा और लार्डगणका सामान्य ही स्थान है । लोकसभामें