संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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कर रहे हैं' ॥८६॥ पार्वतीजीके शरीरकोशसे
अम्बिकाका प्रादुर्भाव हुआ था, इसलिये वे समस्त
लोकोंमें 'कौशिकी' कही जाती हैं ॥ ८७ ॥ कौशिकीके
प्रकट होनेके बाद पार्वतीदेवीका शरीर काले
रंगका हो गया, अतः वे हिमालयपर रहनेवाली
कालिकादेवीके नामसे विख्यात हुई ॥८८॥ तदनन्तर
शुम्भ निशुम्भके भृत्य चण्ड-मुण्ड वहाँ आये
और उन्होंने परम मनोहर रूप धारण करनेवाली
अम्बिकादेवीको देखा ॥८९॥ फिर वे शुम्भके
पास जाकर बोले-'महाराज! एक अत्यन्त मनोहर
स्त्री है, जो अपनी दिव्य कान्तिसे हिमालयको
प्रकाशित कर रही है ॥ ९० ॥ वैसा उत्तम रूप
कहीं किसीने भी नहीं देखा होगा। असुरेश्वर ! पता
लगाइये, वह देवी कौन है और उसे पकड़
लीजिये ॥ ९१ ॥ स्त्रियोंमें तो वह रत्न है, उसका
प्रत्येक अङ्ग बहुत ही सुन्दर है तथा वह अपने
श्रीअङ्गोंकी प्रभासे सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाश
फैला रही है। दैत्यराज ! अभी वह हिमालयपर
ही मौजूद है, आप उसे देख सकते हैं ॥९२॥
प्रभो ! तीनों लोकोंमें मणि, हाथी और घोड़े आदि
जितने भी रत्न हैं, वे सब इस समय आपके घरमें
शोभा पाते हैं ॥९३॥ हाथियोंमें रत्नभूत ऐरावत,
यह पारिजातका वृक्ष और यह उच्चैःश्रवा घोड़ा-यह
सब आपने इन्द्रसे ले लिया है ॥ ९४ ॥ हंसोंसे जुता
हुआ यह विमान भी आपके आँगनमें शोभा पाता
है। यह रत्नभूत अद्भुत विमान, जो पहले
ब्रह्माजीके पास था, अब आपके यहाँ लाया गया
है ॥९५ ॥ यह महापद्म नामक निधि आप कुबेरसे
छीन लाये हैं। समुद्रने भी आपको किञ्जल्किनी
नामकी माला भेंट की है, जो केसरोंसे सुशोभित
है और जिसके कमल कभी कुम्हलाते नहीं ॥ ९६ ॥
सुवर्णकी वर्षा करनेवाला वरुणका छत्र भी आपके
घरमें शोभा पाता है तथा यह श्रेष्ठ रथ, जो पहले
प्रजापतिके अधिकारमें था, अब आपके पास
मौजूद है ॥९७॥ दैत्येश्वर ! मृत्युकी उत्क्रान्तिदा
नामवाली शक्ति भी आपने छीन ली है तथा
वरुणका पाश और समुद्रमें होनेवाले सब प्रकारके
रत्न आपके भाई निशुम्भके अधिकारमें हैं। अग्निने
भी स्वतः शुद्ध किये हुए दो वस्त्र आपकी सेवामें
अर्पित किये हैं ॥९८-९९ ॥ दैत्यराज ! इस प्रकार
सभी रत्न आपने एकत्र कर लिये हैं। फिर जो यह
स्त्रियोंमें रत्नरूप कल्याणमयी देवी है, इसे आप
क्यों नहीं अपने अधिकारमें कर लेते ?॥ १००॥
ऋषिरुवाच ॥ १०१ ॥
निशम्येति वचः शुम्भः स तदा चण्डमुण्डयोः ।
प्रेषयामास सुग्रीवं दूतं देव्या महासुरम् ॥ १०२ ॥
इति चेति च वक्तव्या सा गत्वा वचनान्मम ।
यथा चाभ्येति सम्प्रीत्या तथा कार्य त्वया लघु ॥ १०३॥
स तत्र गत्वा यत्रास्ते शैलोद्देशेऽतिशोभने ।
सां देवी तां ततः प्राह श्लक्ष्णं मधुरया गिरा ॥ १०४॥
ऋषि कहते हैं- ॥१०१॥ चण्ड-मुण्डका
यह वचन सुनकर शुम्भने महादैत्य सुग्रीवको दूत
बनाकर देवीके पास भेजा और कहा- 'तुम
मेरी आज्ञासे उसके सामने ये-ये बातें कहना
और ऐसा उपाय करना जिससे प्रसन्न होकर
वह शीघ्र ही यहाँ आ जाय' ॥ १०२-१०३ ॥ वह
दूत पर्वतके अत्यन्त रमणीय प्रदेशमें, जहाँ देवी
मौजूद थीं, गया और मधुर वाणीमें कोमल वचन
बोला ॥ १०४॥
दूत उवाच ॥ १०५ ॥
देवि दैत्येश्वरः शुम्भस्त्रैलोक्ये परमेश्वरः।
दूतोऽहं प्रेषितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः ॥१०६ ॥
अव्याहताज्ञः सर्वासु यः सदा देवयोनिषु ।
निर्जिताखिलदैत्यारिः स यदाह शृणुष्व तत् ॥ १०७ ॥
१. पा०-इसके बाद कहीं-कहीं 'शुम्भ उवाच' इतना अधिक पाठ है। २. पा०-तां च देवीं ततः।