मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका । ६१
नहीं । यह बात मनु, याज्ञवल्क्य, व्यास आदि के वाक्यों
से विवेक रखनेवालों को अज्ञात नहीं है इसीलिये अधिक
कहना व्यर्थ है । और उक्त वाक्यों से जो चक्रशंख से शरीर
का अङ्कन तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र का धारण विधान किया है उसमें से
चक्र-शङ्ख वा धनुर्वाण से वैष्णवों का अङ्कन; १ और त्रिशूल-
डमरू से शैवों का अङ्कन; त्रै२वर्णिकों का धर्म नहीं है, किंतु
अन्यों का धर्म है । और ऊर्ध्वपुण्ड्र का धारण त्रैवर्णिक-धर्म
भी है; परन्तु नाना द्रव्यों से नानाप्रकार का ऊर्ध्वपुण्ड्र सर्व-
वैष्णव-मान्य नहीं है, अत एव प्रत्येक संप्रदायों के ऊर्ध्वपुण्ड्रों
के आकार पुराणों में नहीं प्राप्त होते । अङ्कन के विषय में कतिपय
श्रुति प्रमाण दी जाती हैं उनमें से पहली श्रुति यह है—
‘ पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः ।
अतप्ततनूर्नतदामोऽश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत्समासत ॥ ’
( ऋक् सं० ७ अष्टक ३ अध्या० ८ वर्ग ५ मं० ) .
इस मन्त्र से अङ्कन कथमपि नहीं सिद्ध होता । यह सोम
के सम्बन्ध का मन्त्र है ( देखिये वेदभाष्य )
दूसरी श्रुति-
‘ सहोवाच याज्ञवल्क्यः, तस्मात् पुमान् आत्महिताय हरिं
भजेत् । सुश्लोकमौलेर्वर्माप्यग्निना संदधते ॥ ’
यह श्रुति ‘ शतपथ ’ के नाम से निर्णयसिन्धु में लिखी
है; परंतु ‘ शतपथ ’ में नहीं प्राप्त होती ।
१-२ धनुर्वाण से अङ्कन अर्थात् तप्तमुद्रा धारण वैरागियों में और त्रिशूल-
डमरू से अङ्कन लिङ्गायतों में प्रसिद्ध है ।
३ शिवकेशवयोरङ्कान् शङ्खचक्रादिकान् द्विजः ।
न धारयेत मतिमान् वैदिके वर्त्मनि स्थितः ॥ ’
निर्णयसिन्धु २ परि.