मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 542, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें४०२ . मनुस्मृति ।
मांगे। क्योंकि शूद्रभिक्षा से यज्ञ करनेवाला मरकर चण्डाल
होता है ॥ १७-२४ ॥
यज्ञार्थमर्थं भिक्षित्वा यो न सर्वं प्रयच्छति ।
स याति भासतां विप्रः काकतां वा शतं समाः ॥ २५॥
देवस्वं ब्राह्मणस्वं वा लोभेनोपहिनास्ति यः ।
स पापात्मा परे लोके गृध्रोच्छिष्टेन जीवति ॥ २६ ॥
इष्टिं वैश्वानरीं नित्यं निर्वपेदब्दपर्यये ।
क्लृप्तानां पशुसोमानां निष्कृत्यर्थमसम्भवे ॥ २७ ॥
आपत्कल्पेन यो धर्मं कुरुतेऽनापदि द्विजः ।
स नाप्नोति फलं तस्य परत्रेति विचारितम् ॥ २८ ॥
विश्वैश्च देवैः साध्यैश्च ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः ।
आपत्सु मरणाद्भीतैर्विधेः प्रतिनिधिः कृतः ॥ २६ ॥
जो ब्राह्मण यज्ञ के लिए धन मांगकर यज्ञ में नहीं लगाता वह
मरकर सौ वर्ष भास वा कौआ की योनि में रहता है । जो देवा-
र्पण या ब्रह्मार्पण किये धन को लोभ से खाजाता है वह पापात्मा
परलोक में गीध की जूठन से जीता है । पशुयाग या सोमयाग
न होसके तो उस दोष की शान्ति के लिए ब्राह्मण को शूद्र से भी
धन लेकर वैश्वानरी इष्टि करनी चाहिए । जो द्विज आपत्काल के
न होते आपत्काल के धर्म से बर्ताव करता है वह परलोक में उसका
फल नहीं पाता । विश्वेदेव, साध्यदेव, महर्षि और ब्राह्मणों ने मृत्यु
से डरकर, आपत्काल में मुख्य विधि के स्थान में प्रतिनिधि
की कल्पना की है ॥ २५-२६ ॥
प्रभुः प्रथमकल्पस्य योऽनुकल्पेन वर्तते ।
न साम्परायिकं तस्य दुर्मतेर्विद्यते फलम् ॥ ३० ॥