मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरी बार में वध की आज्ञा देवे । चोरों को आग, भोजन,
शस्त्र और ठहरने का स्थान देनेवाले को और चोरीका माल रखने
वाले को चोर की भांति दण्ड देवे । जो तालाब बिगाड़े उसको
जल में डुबवादे या प्रत्यक्ष मरवादे या उससे फिर तालाब बन-
वावे और एक हज़ार पण दण्ड करे ॥ २७६-२७६ ॥
कोष्ठागारायुधागारदेवतागारभेदकान् ।
हस्त्यश्वरथहर्तॄंश्च हन्यादेवाविचारयन् ॥ २८० ॥
यस्तु पूर्वनिर्विष्टस्य तडागस्योदकं हरेत् ।
आगमं वाप्यपां भिंद्यात्स दाप्यः पूर्वसाहसम् ॥ २८१ ॥
समुत्सृजेद्राजमार्गे यस्त्वमेध्यमनापदि ।
स द्वौ कार्षापणौ दद्यादमेध्यं चाशु शोधयेत् ॥ २८२ ॥
आपद्गतोऽथवा वृद्धो गर्भिणी बाल एव वा ।
परिभाषणमर्हन्ति तच्च शोध्यमिति स्थितिः ॥ २८३ ॥
राजा का अन्न भण्डार, शस्त्रशाला और देवमंदिर तोड़नेवाले
को और हाथी, घोड़ा, रथ चुरानेवाले को, विना विचार मरवादे ।
जो पूर्व से सब के काम में आनेवाले, जलाशय के जल को अपने
वश में करले या जल के प्रवाह को रोके उसपर ढाई सौ पण
दण्ड करे । जो नीरोग होकर भी खास सड़कों पर मल आदि अप-
वित्र वस्तु डाले उस पर दो कार्षापण दण्ड करे और वह मल
उसीसे उठवावे । परन्तु रोगी, बूढ़ा, गर्भिणी, बालक ऐसा करे तो
उनको मना करदे और स्थान शुद्ध करवावे, यही मर्यादा
है ॥ २८०-२८३ ॥
चिकित्सकानां सर्वेषां मिथ्याप्रहरतां दमः ।
अमानुषेषु प्रथमो मानुषेषु तु मध्यमः ॥ २८४ ॥
संक्रमध्वजयष्टीनां प्रतिमानां च भेदकः ।