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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 649 में से

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पृष्ठ 495

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नवां अध्याय। ३५५
सब भाई यदि कुकर्म में पड़े हों तो धन नहीं पा सकते । बड़ा.
भाई भी छोटे भाई का भाग बिना दिये मिलकियत न करे। भाई
बांटकर जुदे न हुए हों और सब साथ रहकर व्यापारादि करते
हों तो पिता पुत्रों को न्यूनाधिक भाग कभी न दे । विभाग कर
देने पर दूसरा पुत्र होजाय तो वह पिता का ही धन लेता है। या
जो पिता के साथ रहते हों उनसे विभाग करे। पुत्र का पुत्र' मर-
जाय और उसकी स्त्री न हो तो माता धन पावे और माता भी
न रहे तो पिता की माता लेवे। माता-पिता के धन और ऋण
का यथाविधि विभाग करलेने पर यदि कुछ दूसरी सम्पत्ति का
पता लगे तो उसको सब समान बांटलें । वस्त्र, सवारी, पहने
आभूषण, पकान्न, जल, दासी, मंत्री, पुरोहित और गौ चरने का
स्थान इनका विभाग धर्मशास्त्री नहीं करते। अर्थात् जो जिसके
काम में आवे वही उसको रक्खे । इस प्रकार विभाग और क्षेत्रज
आदि पुत्र करने की रीति क्रम से कही गई है । अब द्यूत-जुआ
की व्यवस्था सुनो ॥ २१४-२२० ॥
द्यूतं समाह्वयं चैव राजा राष्ट्रात्निवारयेत् ।
राज्यान्तकारणावेतौ द्वौ दोषौ पृथिवीक्षिताम् ॥२२१॥
प्रकाशमेतत्तास्कर्यं यद्देवनसमाह्वयौ ।
तयोर्नित्यं प्रतीघाते नृपतिर्यत्नवान् भवेत् ॥ २२२ ॥
अप्राणिभिर्यत्क्रियते तल्लोके द्यूतमुच्यते ।
प्राणिभिः क्रियते यस्तु स विज्ञेयः समाह्वयः ॥ २२३ ॥
द्यूतं समाह्वयं चैव यः कुर्यात् कारयेत वा ।
तान्सर्वान् घातयेद्राजा शूद्रांश्च द्विजलिङ्गिनः॥२२४॥
कितवान्कुशीलवान् क्रूरान्पाखण्डस्थांश्च मानवान् ।
विकर्मस्थाञ्शौण्डिकांश्च क्षिप्रं निर्वासयेत्पुरात्॥२२५॥