मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 488, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें३४८ मनुस्मृति ।
मातापितृविहीनो यस्त्यक्तो वा स्यादकारणात् ।
आत्मानं स्पर्शयेद्यस्मै स्वयं दत्तस्तु स स्मृतः ॥ १७७॥
यं ब्राह्मणस्तु शूद्रायां कामादुत्पादयेत्सुतम् ।
सं पारयन्नेव शवस्तस्मात्पारशवः स्मृतः ॥ १७८ ॥
दास्यां वा दासदास्यां वा यः शूद्रस्य सुतो भवेत् ।
सोऽनुज्ञातो हरेदंशमिति धर्मो व्यवस्थितः ॥ १७६ ॥
जो अपनी उत्तर क्रिया के लिए माता-पिता से जिस पुत्र को
खरीदता है वह उसका 'क्रीतक पुत्र' होता है, खरीददार के स-
मान हो अथवा न हो । पति की त्यागी या विधवा स्त्री दूसरे की
स्त्री होकर पुत्र जने उसको 'पौनर्भव' कहते हैं। वह पति की
त्यागी या विधवा स्त्री अक्षतयोनि हो तो, प्रायश्चित्त करके दू-
सरे—पुनर्भू पति के पास रह सकती है । जो माता-पिता से हीन
हो, बिना कारण ही जिस पुत्र को माता-पिता ने त्याग दिया हो, वह
अपने को जिसे देदे वह 'स्वयं दत्त' पुत्र कहाता है। ब्राह्मण का-
मना से शूद्रा में जिस पुत्र को पैदा करे, वह जीता ही मुर्दा के मु-
वाफ़िक़ है इसलिये उसे 'पारशव' कहते हैं। शूद्र का दासी में या
दास की दासी में जो पुत्र हो, वह पिता की आज्ञा से अपना भाग
लेये-यह धर्ममर्यादा है ॥ १७४-१७६ ॥
क्षेत्रजादीन्सुतानेतानेकादश यथोदितान् ।
पुत्रप्रतिनिधीनाहुः क्रियालोपान् मनीषिणः ॥ १८०॥
य एतेऽभिहिताः पुत्राः प्रसङ्गादन्यवीजजाः ।
यस्य ते बीजतो जातास्तस्य ते नेतरस्य तु ॥ १८१ ॥
ये क्षेत्रज आदि जो ग्यारह पुत्र कहे हैं, उनको पितर क्रिया का
लोप न हो—इसकारण पुत्र-प्रतिनिधि आचार्यों ने कहा है। ये