मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआठवां अध्याय । २६१
क्षेत्रकूपतडागानामारामस्य गृहस्य च ।
सामन्तप्रत्ययो ज्ञेयः सीमासेतुविनिर्णयः ॥ २६२ ॥
खेत, कुआं, तालाब, बगीचा और घरों की सीमा का निर्णय
आसपास के गवाहों से करना चाहिए ॥ २६२ ॥
सामन्ताश्चेन्मृषा ब्रूयुः सेतौ विवदतां नृणाम् ।
सर्वे पृथक् पृथग्दण्ड्याः राज्ञा मध्यमसाहसम्॥ २६३॥
गृहं तडागमारामं क्षेत्रं वा भीषया हरन् ।
शतानि पञ्च दण्ड्यः स्यादज्ञानाद् द्विशतो दमः॥२६४॥
सीमायामविषह्यायां स्वयं राजैव धर्मवित् ।
प्रविशेद्भूमिमेतेषामुपकारादिति स्थितिः ॥ २६५ ॥
एषोऽखिलेनाभिहितो धर्मः सीमाविनिर्णये ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वाक्पारुष्यविनिर्णयम् ॥ २६६ ॥
यदि सीमाके झगड़े में पास के सामन्त झूठ बोलें तो हर एक
को पांच पांच सौ पण दण्ड करे । घर, तालाब, बगीचा वा खेत
को डर दिखा कर कोई छीनले तो पांचसौ पण उसपर दण्ड करे
और अजान में ले तो दोसौ पण दण्ड करे । सीमा के निर्णय का
कोई भी ठीक सबूत न मिले तो धर्मज्ञ राजा स्वयं सीमा को बांध
दे यही मर्यादा है इस भांति सब सीमा निर्णय का विषय कहा
गया है, अब कठोर वचन का निर्णय कहा जायगा ॥ २६३-२६६ ॥
शतं ब्राह्मणमाक्रुश्य क्षत्रियोदण्डमर्हति ।
वैश्योऽप्यर्धशतं द्वे वा शूद्रस्तु वधमर्हति ॥ २६७ ॥
पञ्चाशद् ब्राह्मणो दण्ड्यः क्षत्रियस्याभिशंसने ।
वैश्ये स्यादर्धपञ्चाशच्छूद्रे द्वादशको दमः ॥ २६८ ॥