मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 402, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें२६२ मनुस्मृति ।
प्रातःकाल सच सच वृत्तान्त पूछे । ब्राह्मण से 'कहो' ऐसा पूछे ।
क्षत्रिय से 'सच बोलो' इस भांति पूछे । और 'गौ, बीज, सोना
चुराने का पातक तुमको होगा' ऐसा कहकर वैश्यों से पूछे ।
'सब पाप तुमको लगेगा' यों कहकर शूद्र से साक्षी लेवे । ब्राह्मण,
स्त्री, बालक को मारनेवाले को और मित्रद्रोही, कृतघ्न को
जो जो लोक मिलते हैं वेही लोक झूठ बोलनेवाले को मिलते हैं।
हे भद्र पुरुष ! जन्म से लेकर तूने जो कुछ पुण्य किया है, वह सब
झूठी गवाही देगा तो, कुत्ते को पहुँचेगा । हे भद्र ! तू यह जो
मानता है कि, मैं अकेला जीवात्मा हूं सो न मान । क्योंकि-पुण्य,
पाप को देखनेवाला अन्तर्यामी नित्य हृदय में ही स्थित है।
यमरूप वैवस्वत देव हृदय में स्थित हैं, उसमें विश्वास रखने से
गङ्गा और कुरुक्षेत्र जाने की ज़रूरत नहीं है । जो झूठी गवाही
देता है-उसको नङ्गा, शिर मुड़ाकर, भूखा, प्यासा और अंधा
होकर, हाथ में ठीकरा लेकर शत्रु के घर भीख मांगने जाना
पड़ता है। जो झूठ साक्षी पूंछने पर देता है। वह पापी नीचे
शिर होकर, अँधरे नरक में पड़ता है ॥ ८७-६४ ॥
अन्धो मत्स्यानिवाश्नाति स नरः कण्टकैः सह ।
यो भाषतेऽर्थवैकल्यमप्रत्यक्षं सभां गतः ॥ ६५ ॥
यस्य विद्वान् हि वदतः क्षेत्रज्ञो नाभिशङ्कते ।
तस्मान्न देवाः श्रेयांसं लोकेऽन्यं पुरुषं विदुः ॥ ६६ ॥
यावतो बान्धवान् यस्मिन् हन्ति साक्ष्येऽनृतं वदन् ।
तावतः संख्यया तस्मिन् शृणु सौम्य़ानुपूर्वशः ॥ ६७ ॥
पञ्च पश्वनृते हन्ति दश हन्ति गवानृते ।
शतमश्वानृते हन्ति सहस्रं पुरुषानृते ॥ ६८ ॥
हन्ति जातानजातांश्च हिरण्यार्थेऽनृतं वदन् ।
सर्वं भूम्यनृते हन्ति मास्म, भूम्यनृतं वदीः ॥ ६६ ॥