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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 649 में से

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पृष्ठ 291

चौथा अध्याय। १५१
अभिशस्तस्य षण्ढस्य पुंश्चल्या दाम्भिकस्य च ।
शुक्लं पर्युषितं चैव शूद्रस्योच्छिष्टमेव च ॥ २११ ॥
चिकित्सकस्य मृगयोः क्रूरस्योच्छिष्टभोजिनः ।
उग्रान्नं सूतिकान्नं च पर्याचान्तमनिर्देशम् ॥ २१२ ॥
चोर, गवैया, बढ़ई, व्याजखोर, अग्नीसोमीय यज्ञ न करके यज्ञ
में दीक्षित, कृपण और क़ैदी का अन्न न खाना। महापातकी, नपुंसक,
व्यभिचारिणी स्त्री, कपटब्रह्मचारी का अन्न, खट्टा, बासी और शूद्र
का जूॅठा अन्न न खाना। वैद्य का, शिकारी का, क्रूर का, जूठन खाने
वाले का, क्रूर कर्म करनेवाले का, दश दिन तक सूतक का और
पर्याचान्त * इन सब अन्नों को न खाना चाहिए ॥ २१०-२१२ ॥
अनर्चितं वृथामांसमवीरायाश्च योषितः ।
द्विषदन्नं नगर्य्यन्नं पतितान्नमवक्षुतम् ॥ २१३ ॥
पिशुनानृतिनोश्चान्नं क्रतुविक्रयिणस्तथा ।
शैलूषतुन्नवायान्नं कृतघ्नस्यान्नमेव च ॥ २१४ ॥
कर्म्मारस्य निषादस्य रङ्गावतारकस्य च ।
सुवर्णकर्तुर्वैणस्य शस्त्रविक्रयिणस्तथा ॥ २१५ ॥
श्ववतां शौण्डिकानाञ्च चैलनिर्णेजकस्य च ।
रजकस्य नृशंसस्य यस्य चोपपतिर्गृहे ॥ २१६ ॥
अपमान से दिया अन्न, वृथामांस, पति-पुत्र हीन स्त्री का, शत्रु
के नगर का, पतित मनुष्य का और जिसके ऊपर छींक भई हो
वह अन्न न खाना। चुगल, झूठा, यज्ञ फल बेचनेवालों का अन्न,
नट, दर्जी और कृतघ्न का अन्न त्याग देना। लोहार, भील, बहुरू-

  • एक पंक्ति में भोजन करते हों तभी दूसरी पंक्ति में यदि कोई भोजन विश्राम
    करके आचमन करले तो उसको 'पर्याचान्त' कहते हैं। ऐसा होजाने पर भोजन बंद कर
    देना चाहिए ।