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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 649 में से

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पृष्ठ 124

१२२ मनुस्मृति ।
'मनुर्वै यत्किंचिदवदत्तद्भेषजं भेषजतायाः ।'
अर्थात् मनु ने जो कुछ कहा है वह सब औषध के तुल्य
ग्राह्य है उस बारे में कुतर्क करने का अवकाश नहीं है । भारत
में भी कहा है कि-
'पुराणं मानवो धर्मः साङ्गो वेदश्चिकित्सितम् ।
आज्ञासिद्धानि चत्वारि न हन्तव्यानि हेतुभिः ॥'
यहां पुराण से वेदार्थसंवादी पुराणभाग का ग्रहण इष्ट है
और जब सांख्ययोग आदि परिच्छिन्न-दर्शन का ही निरंकुश
प्रामाण्य नहीं है तो अपरिच्छिन्न पुराणों का निरंकुश प्रामाण्य
होना कैसे संभव है ? यह बात वैयासिक ब्रह्मसूत्रों से भी
स्पष्ट है किंबहुना-पदार्थसंशय में साधुदृष्टि से अनूचान-विद्व-
ज्जन पूर्वोत्तरमीमांसा के अनुसार प्रमेय परीक्षा कर सकते हैं,
यह बात मनुस्मृति से भी स्पष्ट जानी जाती है । परंतु फिरभी
'ऐकोऽप्यध्यात्मवित्तमः' की आवश्यकता पड़ती है, यह
१ 'मनोर्ऋचः सामधेन्यो भवन्ति' इत्यस्य विधेर्वाक्यशेषे श्रूयते ।
२ 'सयथार्द्रैधाग्नेरभ्याहितस्य पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो
भूतस्य निश्वसितमेतद्यग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसइतिहासः पुराणं विद्या
उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानि-' श० प० कां० १४
अ० ६ ब्रा० ६ कं० ११ ।
३ । यद्यपि पुराण परिच्छिन्न है तो भी साधन के दौर्बल्य से अपरिच्छिन्न कहना
पड़ा ।
४ परपक्षनिराकरण-रीति के अनुसार ।
५ गुरुमुख से वेदवेदाङ्ग पढ़े हुए ।
६ ' विरोधेत्वनपेक्ष्यं स्यादसतिह्यनुमानम्' पू० मी० १ अ० ३ पा० ३ सू०
'स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात्' उ० मी० २ अ०
१ पा० १ सू० ।
७ याज्ञवल्क्यस्मृति ।