मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमन्त्ररामायण ७५
निरुद्धस्तानेव कर्षन् यथेष्टं सञ्चरतीति भावः ॥ १०२ ॥
अक्षानहो नह्यत नोत सोम्या इष्कृणुध्वं रशना ओत पिंशत ।
अष्टाबन्धुरं वहताभितो रथं येन देवासो अनयन्नभि सप्रियम् ॥१०३
ऋ. १०. ५३, ७
ब्रह्मपाश के बन्धन को भी न मानने पर हनुमान से देवता प्रार्थना
करते हैं कि ब्रह्मपाश का अपमान नहीं करना चाहिये । 'हे सौम्य !
रावणपुत्र अक्ष को मृत्युपाश में बाँधते हुए तुमने अपने को नहीं बाँधा ।
ब्रह्मपाश को स्वीकार करके बाद में उसे खण्डित कर देना ।' आठ जगह
से बँधे हुए अपने शरीर को नगर में पहुंच कर हनुमान ने देवताओं का
प्रिय कार्य किया ।
स एवं ब्रह्मपाशैर्बद्धोऽपि तान् यदा न गणयति तदैनं देवाः प्रार्थयन्ते
ब्रह्मपाशानामपमानो मा भूदित्येतदर्थम्-अक्षानह इति । भोः सोम्याः विष्णुभक्ताः
अक्षानहः अक्षं रावणपु