सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 140
१२०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

| कृतव्यवहाराभ्युपगमात्परमार्था- | व्यवहारको अविद्याकृत माना है, |
| नभ्युपगमाच्च । तस्मादात्मभेद- | परमार्थरूप नहीं माना । अतः |
| परिकल्पना वृथैव तार्किकैः | तार्किकलोग जीवोंके भेदकी कल्पना |
| क्रियत इति ॥ ५ ॥ | वृथा ही करते हैं ॥ ५ ॥ |

व्यावहारिक जीवभेद

| कथं पुनरात्मभेदनिमित्त इव | किन्तु एक ही आत्मामें, आत्माओं- |
| व्यवहार एकस्मिन्नात्मन्यविद्या- | के भेदके कारण होनेवालेके समान, |
| कृत उपपद्यत इति, उच्यते— | अविद्याकृत व्यवहार किस प्रकार |
| | सम्भव है ? इसपर कहते हैं— |

रूपकार्यसमाख्याश्च भिद्यन्ते तत्र तत्र वै ।
आकाशस्य न भेदोऽस्ति तद्वज्जीवेषु निर्णयः ॥ ६ ॥

[घटादि उपाधियोंके कारण प्रतीत होनेवाले] भिन्न-भिन्न आकाशोंके रूप, कार्य और नामोंमें तो भेद है, परन्तु आकाशमें तो कोई भेद नहीं है । उसी प्रकार जीवोंके विषयमें भी निश्चय समझना चाहिये ॥ ६ ॥

| यथेहाकाश एकस्मिन्घटकर- | जिस प्रकार इस एक ही |
| कापवरकाद्याकाशानामल्पत्वम- | आकाशमें घट, कमण्डलु और मठादि |
| हत्त्वादिरूपाणि भिद्यन्ते तथा | आकाशोंके अल्पत्व-महत्त्वादि रूपोंमें |
| कार्यमुदकाहरणधारणशयनादि- | भेद है, तथा जहाँ-तहाँ व्यवहारमें |
| समाख्याश्च घटाकाशकरकाकाश | उनके किये हुए जल लाना, जल |
| इत्याद्यास्तत्कृताश्च भिन्ना दृश्यन्ते । | धारण करना और शयन करना |
| तत्र तत्र वै व्यवहारविषय | आदिकार्य एवं घटाकाश करकाकाश |
| इत्यर्थः। सर्वोऽयमाकाशे रूपादि- | आदि नाम भिन्न-भिन्न देखे जाते हैं। |
| भेदकृतो व्यवहारो न परमार्थ | किन्तु आकाशमें रूपादिके कारण |
| | होनेवाला यह सब व्यवहार पार- |