मानसार शिल्पशास्त्र (प्रसन्ना कुमार आचार्य - प्राचीन भारतीय स्थापत्य, नगर-नियोजन व मूर्ति-शिल्प महाकोश)

मानसार शिल्पशास्त्र (प्रसन्ना कुमार आचार्य - प्राचीन भारतीय स्थापत्य, नगर-नियोजन व मूर्ति-शिल्प महाकोश)
Manasara on Architecture and Sculpture by P.K. Acharya
मानसार ऋषि (अनुवादक: डॉ. प्रसन्ना कुमार आचार्य) द्वारा
DevanagariHindipublished856 पृष्ठ
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CHAPTER LXVII
- B. ऋजु, I. रज्जु; the idea of the recumbent posture is apparent-
ly intended here for which the usual term is शयन। - I. देवलम्बा, B. C. देहलम्ब्या।
- C. लक्षणं, I. प्रक्षणं।
- C. समबरायतं वापि चाध्य।
- I. मुनि, B. C. मान।
- Between this and the next line I. repeats the first pāda of line
- (1) C. मुखाताैर, B. मुखांतादि।
(2) B. द्विसूत्रं for द्विद्विमात्रं। - (1) C. तत् ब्रह्मश्व(स्य)पार्श्वे, B. तत् प्रकृष्टचिरं पार्श्वे।
(2) B. रुजु, C. ऋजु। - B. मन्यंन, C. मत्यनु।
- B. C. चाक्षयो।
- C. पुट, I. पुटैर।
- C. सूत्रह्वलाटमध्यांतं।
- I. चाध for चार्ध suggested by the other Mss.
- After this line C. notices अस्मिन्स्थले पंचपत्रं न्यूनं and omits
the remaining portion of this chapter and also the first 50 lines of the
next chapter. - B. स्रुड्डेा(श्रो)दधायकाये, I. सूत्रोदयं for सूत्रद्वयं suggested by the
other Mss. - I. द्वारं for द्वरन्तरं suggested by the other Mss.
- I. जघनं, B. जङ्घयोः।
- I. ख्वायतम् for मुज्वार्यतं suggested by the other Mss.
- (1) B. चल for नल। (2) B. षडंगुलं for रसाङ्गुलम्।
- B. शिर for शिव।
- I. प्रकोष्ठन्तु कटान्तं च, B. प्रकोष्ठात् कठिरन्तरं च।