मानसार शिल्पशास्त्र (प्रसन्ना कुमार आचार्य - प्राचीन भारतीय स्थापत्य, नगर-नियोजन व मूर्ति-शिल्प महाकोश)
Manasara on Architecture and Sculpture by P.K. Acharya
मानसार ऋषि (अनुवादक: डॉ. प्रसन्ना कुमार आचार्य) द्वारा
पृष्ठ 655, कुल 856 में से
संदर्भ में पढ़ेंCRITICAL NOTES: CHAPTER XV 111
324. I. प्राग्भागे गमने गल for प्राग्दिग्भागेन च मङ्गलम्।
325. (1) I. दक्षिणे for पश्चिमे; the idea of south is contained in
चाभ्य। (2) I. निषत्ति।
326. A. F. ईशाने, B. यैशोने, at the beginning of a word B. writes यो
for ई।
328. (1) J. गच्छ for गतमि। (2) A. F. नित्व, B. सित्व।
329. A. F. भंगकरंजरं for the last expression.
330. A. F. च''''न्य ध्यानेव, B. चान्ये द्वारेत्व।
331. I. याति वते तरुः for यदि पतेत्तरुः, B. जीवतंतितः।
Between the lines. 331 and 332 B. adds:—कालासित्यमंगलं छिन्न
वृक्षमयतंतित्तेत्।
332. I. य''''म, the other Mss. यशुभ।
333. I. वृत्त for वृक्षा।
334. (1) I. तत्रादे, J. तन्नतो। (2) I. न्यास्ति for नास्ति।
335. A. F. समुद्दिष्ट्य।
336. A. F. पश्यन् प्रहार, J. पशून्नद्रहार, B. पशुशांतितृध्वोमः, I. पश्चात्प्राहार-
होमं।
337. I. शाखां कृतं यान्तु, the other Mss. शान्तौ कृतायान्तु।
339. I. संश्रितम्, J. सन्नहम्।
340. I. कंशयः, the other Mss. सर्वशः।
341. I. पदं नितञ्चक्रमिति विरचितम्, J. पतन्ति तमुक्तमिति चिह्नं लिखेत्ततः। In
I.'s reading a word or two are missing without which both sense and
metre are incomplete. The reading in the text is supplied by the
other Mss.
344. I. हत्वा माहिषं, J. हयित्वा महिषों।
345. I. कर्षयेस्तु for कर्षयेत्तु।
346. B. अवतरेस्ततः।
348. J. क्षीरिखं, the other Mss. क्षोरिखौ।
349. (1) A. F. शाखां, B. शांकः, J. शाकां। (2) I. J. वृत्तं for वृक्षं। (3) I.
शमशापं for शमीशाखं। (4) J. तदा।
350. (1) A. F. धारिखं, B: दारिखं। (2) A. F. रौत, B. चित्त for शत।