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सर्वकोश
मानसार शिल्पशास्त्र (प्रसन्ना कुमार आचार्य - प्राचीन भारतीय स्थापत्य, नगर-नियोजन व मूर्ति-शिल्प महाकोश)

मानसार शिल्पशास्त्र (प्रसन्ना कुमार आचार्य - प्राचीन भारतीय स्थापत्य, नगर-नियोजन व मूर्ति-शिल्प महाकोश)

Manasara on Architecture and Sculpture by P.K. Acharya

मानसार ऋषि (अनुवादक: डॉ. प्रसन्ना कुमार आचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished856 पृष्ठ

पृष्ठ 557, कुल 856 में से

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CRITICAL NOTES : CHAPTER IV 13
36. A. F. स्यं निर्जेता, I.J. वस्तु रेव स्यानोजिता भवेत् for विधानं तदेवं स्याद्दुर्जि-
तम् (suggested by B. D.) whereof ऊर्जित is obviously an incorrect
form for वर्जित ।
37. A. F. B. D. विवं च । It would have been more appropriate if
this line could be read before the preceding one.
38. (1) I. J. वास्तोल्ह्ये । (2) B. D. महत् । (3) I. J. च for यः ।
39. B. D. तदुच्छ्रस्य नियात्तस्याद्विजशकाहरा ; the second half of this line
remains more or less obscure.
40. (1) A. F. स्यंभि । (2) I. has a lacuna for बहु, which is supplied
by all other Mss. B. D. न्यमि सादरवस्था स्वर्णी निबहुरसयहु ।
41. (1) A. F. विव, B. D. तिव for बीज । (2) A. F. वृतैः