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सर्वकोश
मल्लपुराण (ज्येष्ठिमल्ल - प्राचीन भारतीय मल्लविद्या, अखाड़ा व्यायाम व कुश्ती महाग्रन्थ)

मल्लपुराण (ज्येष्ठिमल्ल - प्राचीन भारतीय मल्लविद्या, अखाड़ा व्यायाम व कुश्ती महाग्रन्थ)

Malla Purana: Ancient Indian Wrestling & Martial Arts

ज्येष्ठिमल्ल परम्परा (सम्पादक: भोगीलाल ज. सांडेसरा एवं आर. एन. मेहता) द्वारा

DevanagariSanskritpublished141 पृष्ठ

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Plate Label and Manuscript Header

Plate II
पत्र-शीर्षक (Folio Header & Number): ५८ (Folio 58) | ॥ मल्लपुराणं ॥


मूल संस्कृत पाण्डुलिपि पाठ (Transcription of Sanskrit Manuscript Folio 58b - Ms. B)

चेष्टाभियुक्तस्येह करादेर्व्रणशीतलं च विशेषतः ॥२१॥ शृङ्गाटमांसमद्यं च स्निग्धं दधिकरं परं ॥ [अक्षर-विलोपन / Haritāla erasure]
[अक्षर-विलोपन / Erasure] ॥२४॥ कुक्कुटास्तद्गुणाः प्रोक्तास्तथा वातात्परं परं ॥ रससंत्रासबद्धं परं कफवातहरं तथा ॥२५॥
अथ भोजनं ॥ अतिमात्रं न भुंजीत गलगंडस्य कारणं ॥ भोजनं हीनमात्रं च वलहंतृ न संशयं ॥२६॥ तुष्टा पुष्टौ मते
हस्तिनो बलमथवा भवति प्रवृद्धं भोजनं नृणां ॥ यदन्यवर्धयेद्धात्वाननलो वा मुनेरितः ॥२७॥ गोधूमपिष्टकेनापि
पावकंश्रयणविधिर्गुल्मकरं सोऽविसमुत्थोऽष्टौ तेनापि त्रिगुणोन वा ॥२८॥ वसंतभवगोधूमाः षोडशांगुलदीर्घकम्
घृतसुधौ ततो मुष्टिं कृत्वा त्रीन्कांश्चित्कंभुभोः ॥२९॥ पाटावाली ततः कार्या पयसि तैलवर्जिता ॥ शशांककि-
-रणैराशा सेवितं घृतमिदं मुहुः ॥३०॥ ॥ इति श्रीमल्लपुराणे नवमं प्रकरणं समाप्तं ॥ शुभं भवतु ॥
संवत् १७३१ वर्षे वैशाष वद ११ सोमे अद्येह श्री... लिषितं तं नंद्रा देण ॥
पंचोत्तर पंचशतं च मल्लसंख्या पिता च ऋषिपुरेणान्मस्ता ॥ तेभ्यः प्रदत्तं निजगात्रवीर्य्याशयी रस्ता-
-प्या रिपुनाशकारी ॥१॥


पाद-टिप्पणी एवं अंग्रेजी विवरण (Caption & Accompanying Text)

Caption: The last page of the Ms. B.—Bhāṇḍārkar Oriental Research Institute Collection, Poona.
Previous Work :
The Mallapurā[ṇa]...
the references to Malla[s]...
and Gujarati works...
"Jyeṣṭhimalla jñāt[i]...
Sandesara, published...
publication is by S[hri]...
Community of Sout[h]...
published in 1960 as...
the Mythic Society, ...
of Mallapurāṇa in C...
The first two ...
both in Gujarat and ...
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Vidyā " by late Pro[f]...
reported by Vyank[at]...
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Date of Mallapurā[ṇa] :
Mallapurāṇa, ...
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The langua[ge]...
Apabhraṁśa. It...
this work reflects...
besides Apabhraṁ[śa]...


हिन्दी अनुवाद एवं आहार-विज्ञान / मल्ल-पोषण विश्लेषण (Hindi Translation & Commentary)

व्यायाम एवं व्रणोपचार (श्लोक २१): अत्यधिक शारीरिक चेष्टा (मल्ल-युद्ध/परिश्रम) करने वाले मल्ल के हाथों व अंगों के व्रणों (चोटों) के लिए शीतल उपचार विशेष रूप से विहित है।
आहार्य द्रव्य (श्लोक २१-२५): शृङ्गाटक (सिंघाड़ा), मांस, मद्य, स्निग्ध पदार्थ तथा दही मल्ल के पोषण व पुष्टि के लिए श्रेष्ठ हैं। कुक्कुट (मुर्गे) का मांस वातशामक गुणों से युक्त तथा रस-संस्त्राव को रोककर कफ और वात का शमन करने वाला कहा गया है।
भोजन की मात्रा एवं दोष (श्लोक २६): अतिमात्र (आवश्यकता से अधिक) भोजन कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह गलगण्ड (गले के विकार) एवं अग्निमांद्य का कारण बनता है। इसी प्रकार हीनमात्र (अल्प) भोजन बल का नाश करता है।
बल एवं धातु-वृद्धि (श्लोक २७): सम्यक् रूप से किया गया भोजन मनुष्य को हाथी के समान अपार बल प्रदान करता है तथा धातुओं और जठराग्नि को प्रदीप्त करता है।
गोधूम (गेहूँ) की पाक-विधि (श्लोक २८-२९): वसंत ऋतु के गेहूँ के आटे से सोलह अंगुल परिमाण के व्यंजन का निर्माण कर, घृत में संस्कारित कर विशिष्ट पाक तैयार किया जाता है।
पाटावाली पाक एवं औषधीय घृत (श्लोक २९-३०): दूध में तैल-रहित 'पाटावाली' तैयार की जाती है। इस प्रकार सिद्ध किया गया घृत चंद्र-किरणों से शीतल होकर मल्ल के बल, वीर्य और पुष्टि को बढ़ाता है।
अध्याय समाप्ति एवं पुष्पिका: नवम प्रकरण (भोजनविधि/आहार प्रकरण) पूर्ण। लिपि काल: संवत् १७३१, वैशाख वदी ११, सोमवार।