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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 951, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 951

हंससारसयुक्तं च विमानं लभते नरः ।
इन्द्रलोके च वसते वरस्त्रीभिः समावृतः ॥ १५ ॥
वह मानव हंस और सारसोंसे जुते हुए विमानको पाता है और इन्द्रलोकमें सुन्दरी स्त्रियोंसे घिरा हुआ निवास करता है ॥ १५ ॥
तृतीये दिवसे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम् ।
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ॥ १६ ॥
अग्निकार्यपरो नित्यं नित्यं कल्यप्रबोधनः ।
अतिरात्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ १७ ॥
जो बारह महीनोंतक प्रति तीसरे दिन एक समय भोजन करता, नित्य सबेरे उठता और अग्निकी परिचर्यामें तत्पर हो नित्य अग्निमें आहुति देता है, वह अतिरात्र यागका परम उत्तम फल पाता है ॥ १६-१७ ॥
मयूरहंसयुक्तं च विमानं लभते नरः ।
सप्तर्षीणां सदा लोके सोऽप्सरोभिर्वसेत् सह ॥ १८ ॥
निवर्तनं च तत्रास्य त्रीणि पद्मानि चैव ह ।
उसे मोरोंसे जुता हुआ विमान प्राप्त होता है और वह सदा सप्तर्षियोंके लोकमें अप्सराओंके साथ निवास करता है। वहाँ तीन पद्म वर्षोंतक वह निवास करता है ॥ १८ १/२ ॥
दिवसे यश्चतुर्थे तु प्राश्नीयादेकभोजनम् ॥ १९ ॥
सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् ।
वाजपेयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ २० ॥
जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ बारह महीनोंतक प्रति चौथे दिन एक बार भोजन करता है, वह वाजपेय यज्ञका परम उत्तम फल पाता है ॥ १९-२० ॥
इन्द्रकन्याभिरूढं च विमानं लभते नरः ।
सागरस्य च पर्यन्ते वासवं लोकमावसेत् ॥ २१ ॥
देवराजस्य च क्रीडां नित्यकालमवेक्षते ।
उस मनुष्यको देवकन्याओंसे आरूढ़ विमान उपलब्ध होता है और वह पूर्वसागरके तटपर इन्द्रलोकमें निवास करता है तथा वहाँ रहकर वह प्रतिदिन देवराजकी क्रीडाओंको देखा करता है ॥ २१ १/२ ॥
दिवसे पञ्चमे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम् ॥ २२ ॥
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ।
अलुब्धः सत्यवादी च ब्रह्मण्यश्चाविहिंसकः ॥ २३ ॥
अनसूयुरपापस्थो द्वादशाहफलं लभेत् ।