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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 927, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 927

न चास्नातां स्त्रियं गच्छेत् तथायुर्विन्दते महत् ॥ १०७ ॥
दिनमें कभी मैथुन न करे। कुमारी कन्या और कुलटाके साथ कभी समागम न करे। अपनी पत्नी भी जबतक ऋतुस्नाता न हो तबतक उसके साथ समागम न करे। इससे मनुष्यको बड़ी आयु प्राप्त होती है ॥
स्वे स्वे तीर्थे समाचम्य कार्ये समुपकल्पिते ।
त्रिःपीत्वाऽऽपो द्विः प्रमृज्य कृतशौचो भवेन्नरः ॥ १०८ ॥
कार्य उपस्थित होनेपर अपने-अपने तीर्थमें आचमन करके तीन बार जल पीये और दो बार ओठोंको पोंछ ले—ऐसा करनेसे मनुष्य शुद्ध हो जाता है ॥ १०८ ॥
इन्द्रियाणि सकृत्स्पृश्य त्रिर्भ्युक्ष्य च मानवः ।
कुर्वीत पित्र्यं दैवं च वेददृष्टेन कर्मणा ॥ १०९ ॥
पहले नेत्र आदि इन्द्रियोंका एक बार स्पर्श करके तीन बार अपने ऊपर जल छिड़के, इसके बाद वेदोक्त विधिके अनुसार देवयज्ञ और पितृयज्ञ करे ॥ १०९ ॥
ब्राह्मणार्थे च यच्छौचं तच्च मे शृणु कौरव ।
पवित्रं च हितं चैव भोजनाद्यन्तयोस्तथा ॥ ११० ॥
कुरुनन्दन! अब ब्राह्मणके लिये भोजनके आदि और अन्तमें जो पवित्र एवं हितकारक शुद्धिका विधान है, उसे बता रहा हूँ, सुनो ॥ ११० ॥
सर्वशौचेषु ब्राह्मेण तीर्थेन समुपस्पृशेत् ।
निष्ठिव्य तु तथा क्षुत्त्वा स्पृश्यापो हि शुचिर्भवेत् ॥ १११ ॥
ब्राह्मणको प्रत्येक शुद्धिके कार्यमें ब्राह्मतीर्थसे आचमन करना चाहिये। थूकने और छींकनेके बाद जलका स्पर्श (आचमन) करनेसे वह शुद्ध होता है ॥
वृद्धो ज्ञातिस्तथा मित्रं दरिद्रो यो भवेदपि ।
(कुलीनः पण्डित इति रक्ष्या निःस्वाः स्वशक्तितः ।)
गृहे वासयितव्यास्ते धन्यमायुष्यमेव च ॥ ११२ ॥
बूढ़े कुटुम्बी, दरिद्र मित्र और कुलीन पण्डित यदि निर्धन हों तो उनकी यथाशक्ति रक्षा करनी चाहिये। उन्हें अपने घरपर ठहराना चाहिये। इससे धन और आयुकी वृद्धि होती है ॥ ११२ ॥
गृहे पारावता धन्याः शुकाश्च सहसारिकाः ।
गृहेष्वेते न पापाय तथा वै तैलपायिकाः ॥ ११३ ॥
(देवता प्रतिमाऽऽदर्शाश्चन्दनाः पुष्पवल्लिकाः ।
शुद्धं जलं सुवर्णं च रजतं गृहमंगलम् ॥)
परेवा, तोता और मैना आदि पक्षियोंका घरमें रहना अभ्युदयकारी एवं मंगलमय है। ये तैलपायिक पक्षियोंकी भाँति अमंगल करनेवाले नहीं होते। देवताकी प्रतिमा, दर्पण, चन्दन,