महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 897, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंततोऽपरे भान्ति लोकाः सनातना
विरजसो वितमस्का विशोकाः ।
आदित्यदेवस्य पदं महात्मन-
स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ३२ ॥
**गौतमने कहा—**राजन्! सोमलोकसे भी ऊपर कितने ही सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, जो रजोगुण, तमोगुण और शोकसे रहित हैं। वे महात्मा सूर्यदेवके स्थान हैं। वहाँ जाकर भी मैं तुमसे अपना हाथी वसूल करूँगा ।।
धृतराष्ट्र उवाच
स्वाध्यायशीला गुरुशुश्रूषणे रता-
स्तपस्विनः सुव्रताः सत्यसंधाः ।
आचार्याणामप्रतिकूलभाषिणो
नित्योत्थिता गुरुकर्मस्वचोद्याः ॥ ३३ ॥
तथाविधानामेष लोको महर्षे
विशुद्धानां भावितो वाग्यतानाम् ।
सत्ये स्थितानां वेदविदां महात्मनां
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३४ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**महर्षे! जो स्वाध्यायशील, गुरुसेवापरायण, तपस्वी, उत्तम व्रतधारी, सत्यप्रतिज्ञ, आचार्योंके प्रतिकूल भाषण न करनेवाले, सदा उद्योगशील तथा बिना कहे ही गुरुके कार्यमें संलग्न रहनेवाले हैं, जिनका भाव विशुद्ध है, जो मौनव्रतावलम्बी, सत्यनिष्ठ और वेदवेत्ता महात्मा हैं, उन्हीं लोगोंके लिये यह सूर्यदेवका लोक है, परंतु धृतराष्ट्र वहाँ भी जानेवाला नहीं है ॥ ३३-३४ ॥
गौतम उवाच
ततोऽपरे भान्ति लोकाः सनातनाः
सुपुण्यगंधा विरजा विशोकाः ।
वरुणस्य राज्ञः सदने महात्मन-
स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ३५ ॥
**गौतमने कहा—**उसके सिवा दूसरे भी बहुत-से सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, जहाँ पवित्र गंध छायी रहती है। वहाँ न तो रजोगुण है और न शोक ही। महामना राजा वरुणके लोकमें वे स्थान हैं। वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ३५ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
चातुर्मास्यैर्यै यजन्ते जनाः सदा