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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 888, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 888

प्राणियोंपर क्रोध करता और पशुओंके पृष्ठका मांस खाता था; उसी दुराचार और अभक्ष्य-भक्षणसे मैं इस दुरवस्थाको प्राप्त हुआ हूँ। कालके इस उलट-फेरको देखिये।।
आदीप्तमिव चैलान्तं भ्रमरैरिव चार्दितम् ।। २० ।।
धावमानं सुसंरब्धं पश्य मां रजसान्वितम् ।
मेरी दशा ऐसी हो रही है, मानो मेरे कपड़ोंके छोरमें आग लग गयी हो अथवा तीखे मुखवाले भ्रमरोंने मुझे डंक मार-मारकर पीड़ित कर दिया हो। मैं रजोगुणसे युक्त हो अत्यंत रोष और आवेशमें भरकर चारों ओर दौड़ रहा हूँ। मेरी दशा तो देखिये ।। २० १/२ ।।
स्वाध्यायैस्तु महत्पापं हरन्ति गृहमेधिनः ।। २१ ।।
दानैः पृथग्विधैश्चापि यथा प्राहुर्मनीषिणः ।
गृहस्थ मनुष्य वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायद्वारा तथा नाना प्रकारके दानोंसे अपने महान् पापको दूर कर देते हैं। जैसा कि मनीषी पुरुषोंका कथन है ।। २१ १/२ ।।
तथा पापकृतं विप्रमाश्रमस्थं महीपते ।। २२ ।।
सर्वसंगविनिर्मुक्तं छन्दांस्युत्तारयन्त्युत ।
पृथ्वीनाथ! आश्रममें रहकर सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्ता हो वेदपाठ करनेवाले ब्राह्मणको यदि वह पापाचारी हो तो भी उसके द्वारा पढ़े जानेवाले वेद उसका उद्धार कर देते हैं ।। २२ १/२ ।।
अहं हि पापयोन्यां वै प्रसूतः क्षत्रियर्षभ ।
निश्चयं नाधिगच्छामि कथं मुच्येयमित्युत ।। २३ ।।
क्षत्रियशिरोमणे! मैं पापयोनिमें उत्पन्न हुआ हूँ। मुझे यह निश्चय नहीं हो पाता कि मैं किस उपायसे मुक्त हो सकूँगा? ।। २३ ।।
जातिस्मरत्वं च मम केनचित् पूर्वकर्मणा ।
शुभेन येन मोक्षं वै प्राप्तुमिच्छाम्यहं नृप ।। २४ ।।
नरेश्वर! पहलेके किसी शुभ कर्मके प्रभावसे मुझे पूर्व-जन्मकी बातोंका स्मरण हो रहा है, जिससे मैं मोक्ष पानेकी इच्छा करता हूँ ।। २४ ।।
त्वमिमं सम्प्रपन्नाय संशयं ब्रूहि पृच्छते ।
चाण्डालत्वात् कथमहं मुच्येयमिति सत्तम ।। २५ ।।
सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ! मैं आपकी शरणमें आकर अपना यह संशय पूछ रहा हूँ। आप मुझे इसका समाधान बताइये। मैं चाण्डाल-योनिसे किस प्रकार मुक्त हो सकता हूँ? ।। २५ ।।

राजन्य उवाच

चाण्डाल प्रतिजानीहि येन मोक्षमवाप्स्यसि ।
ब्राह्मणार्थे त्यजन् प्राणान् गतिमिष्टामवाप्स्यसि ।। २६ ।।

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 888, कुल 2566 में से · SarvaKosh