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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 883, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 883

महातेजस्वी अगस्त्य भी शतक्रतु इन्द्रका कार्य सिद्ध करके द्विजातियोंसे पूजित होकर अपने आश्रमको चले गये ।। ३१ ।।
नहुषोऽपि त्वया राजंस्तस्माच्छापात् समुद्धृतः ।
जगाम ब्रह्मभवनं पश्यतस्ते जनाधिप ।। ३२ ।।
राजन्! तुमने भी नहुषका उस शापसे उद्धार कर दिया। नरेश्वर! वे तुम्हारे देखते-देखते ब्रह्मलोकको चले गये ।। ३२ ।।
तदा स पातयित्वा तं नहुषं भूतले भृगुः ।
जगाम ब्रह्मभवनं ब्रह्मणे च न्यवेदयत् ।। ३३ ।।
भृगु उस समय नहुषको पृथ्वीपर गिराकर ब्रह्माजीके धाममें गये और उनसे उन्होंने यह सब समाचार निवेदन किया ।। ३३ ।।
ततः शक्रं समानाय्य देवानाह पितामहः ।
वरदानान्मम सुरा नहुषो राज्यमाप्तवान् ।। ३४ ।।
स चागस्त्येन क्रुद्धेन भ्रंशितो भूतलं गतः ।
तब पितामह ब्रह्माने इन्द्र तथा अन्य देवताओंको बुलवाकर उनसे कहा—'देवगण! मेरे वरदानसे नहुषने राज्य प्राप्त किया था। परंतु कुपित हुए अगस्त्यने उन्हें स्वर्गसे नीचे गिरा दिया। अब वे पृथ्वीपर चले गये ।।
न च शक्यं विना राज्ञा सुरा वर्तयितुं क्वचित् ।। ३५ ।।
तस्मादयं पुनः शक्रो देवराज्येऽभिषिच्यताम् ।
'देवताओ! बिना राजाके कहीं भी रहना असंभव है। अतः अपने पूर्व इन्द्रको पुनः देवराजके पदपर अभिषिक्त करो' ।। ३५ १/२ ।।
एवं सम्भाष्यमाणं तु देवाः पार्थ पितामहम् ।। ३६ ।।
एवमस्त्विति संहृष्टाः प्रत्यूचुस्तं नराधिप ।
कुन्तीनन्दन! नरेश्वर! पितामह ब्रह्माका यह कथन सुनकर सब देवता हर्षसे खिल उठे और बोले—'भगवन्! ऐसा ही हो' ।। ३६ १/२ ।।
सोऽभिषिक्तो भगवता देवराज्ये च वासवः ।। ३७ ।।
ब्रह्मणा राजशार्दूल यथापूर्वं व्यरोचत ।
राजसिंह! भगवान् ब्रह्माके द्वारा देवराजके पदपर अभिषिक्त हो शतक्रतु इन्द्र फिर पूर्ववत् शोभा पाने लगे ।। ३७ १/२ ।।
एवमेतत् पुरावृत्तं नहुषस्य व्यतिक्रमात् ।। ३८ ।।
स च तैरेव संसिद्धो नहुषः कर्मभिः पुनः ।
इस प्रकार पूर्वकालमें नहुषके अपराधसे ऐसी घटना घटी कि वे नहुष बार-बार दीपदान आदि पुण्यकर्मोंसे सिद्धिको प्राप्त हुए थे ।। ३८ १/२ ।।
तस्माद् दीपाः प्रदातव्याः सायं वै गृहमेधिभिः ।। ३९ ।।