महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विजस्त्रीणां वधं कृत्वा किं दैवेन न वारितः ॥ ३६ ॥
राजा जनमेजय द्विज स्त्रियोंका वध करके इन्द्रके चरणका आश्रय ले जब स्वर्गलोकको प्रस्थित हुए, उस समय दैवने उसे आकर क्यों नहीं रोका ॥ ३६ ॥
अज्ञानाद् ब्राह्मणं हत्वा स्पृष्टो बालवधेन च ।
वैशम्पायनविप्रर्षिः किं दैवेन न वारितः ॥ ३७ ॥
ब्रह्मर्षि वैशम्पायन अज्ञानवश ब्राह्मणकी हत्या करके बाल-वधके पापसे भी लिप्त हो गये थे तो भी दैवने उन्हें स्वर्ग जानेसे क्यों नहीं रोका ॥ ३७ ॥
गोप्रदानेन मिथ्या च ब्राह्मणेभ्यो महामखे ।
पुरा नृगश्च राजर्षिः कृकलासत्वमागतः ॥ ३८ ॥
पूर्वकालमें राजर्षि नृग बड़े दानी थे। एक बार किसी महायज्ञमें ब्राह्मणोंको गोदान करते समय उनसे भूल हो गयी; अर्थात् एक गऊको दुबारा दानमें दे दिया, जिसके कारण उन्हें गिरगिटकी योनिमें जाना पड़ा ॥ ३८ ॥
धुन्धुमारश्च राजर्षिः सत्रेष्वेव जरां गतः ।
प्रीतिदायं परित्यज्य सुष्वाप स गिरिव्रजे ॥ ३९ ॥
राजर्षि धुन्धुमार यज्ञ करते-करते बूढ़े हो गये तथापि देवताओंके प्रसन्नतापूर्वक दिये हुए वरदानको त्यागकर गिरिव्रजमें सो गये (यज्ञका फल नहीं पा सके) ॥
पाण्डवानां हृतं राज्यं धार्तराष्ट्रैर्महाबलैः ।
पुनः प्रत्याहृतं चैव न दैवाद् भुजसंश्रयात् ॥ ४० ॥
महाबली धृतराष्ट्र-पुत्रोंने पाण्डवोंका राज्य हड़प लिया था। उसे पाण्डवोंने पुनः बाहुबलसे ही वापस लिया। दैवके भरोसे नहीं ॥ ४० ॥
तपोनियमसंयुक्ता मुनयः संशितव्रताः ।
किं ते दैवबलात् शापमुत्सृजन्ते न कर्मणा ॥ ४१ ॥
तप और नियममें संयुक्त रहकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनि क्या दैवबलसे ही किसीको शाप देते हैं, पुरुषार्थके बलसे नहीं? ॥ ४१ ॥
पापमुत्सृजते लोके सर्वं प्राप्य सुदुर्लभम् ।
लोभमोहसमापन्नं न दैवं त्रायते नरम् ॥ ४२ ॥
संसारमें समस्त सुदुर्लभ सुख-भोग किसी पापीको प्राप्त हो जाय तो भी वह उसके पास टिकता नहीं, शीघ्र ही उसे छोड़कर चल देता है। जो मनुष्य लोभ और मोहमें डूबा हुआ है उसे दैव भी संकटसे नहीं बचा सकता ॥
यथाग्निः पवनोद्धूतः सुसूक्ष्मोऽपि महान् भवेत् ।
तथा कर्मसमायुक्तं दैवं साधु विवर्धते ॥ ४३ ॥
जैसे थोड़ी-सी भी आग वायुका सहारा पाकर बहुत बड़ी हो जाती है, उसी प्रकार पुरुषार्थका सहारा पाकर दैवका बल विशेष बढ़ जाता है ॥ ४३ ॥