महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 877, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें**भृगु बोले—**मुने! ब्रह्माजीकी आज्ञासे मैं आपके पास आया हूँ। बलवान् नहुष दैववश मोहित हो रहा है। आज उससे ऋषियोंपर किये गये अत्याचारका बदला लेना है॥ २२ ॥
अद्य हि त्वां सुदुर्बुद्धी रथे योक्ष्यति देवराट्।
अद्यैनमहमुद्वृत्तं करिष्येऽनिन्द्रमोजसा ॥ २३ ॥
आज यह महामूर्ख देवराज आपको रथमें जोतेगा। अतः आज ही मैं इस उच्छृंखल नहुषको अपने तेजसे इन्द्रपदसे भ्रष्ट कर दूँगा॥ २३ ॥
अद्येन्द्रं स्थापयिष्यामि पश्यतस्ते शतक्रतुम्।
संचाल्य पापकर्मणमैन्द्रात् स्थानात् सुदुर्मतिम् ॥ २४ ॥
आज इस पापाचारी दुर्बुद्धिको इन्द्रपदसे गिराकर मैं आपके देखते-देखते पुनः शतक्रतुको इन्द्रपदपर बिठाऊँगा॥ २४ ॥
अद्य चासौ कुदेवेन्द्रस्त्वां पदा धर्षयिष्यति।
दैवोपहतचित्तत्वादात्मनाशाय मन्दधीः ॥ २५ ॥
दैवने इसकी बुद्धिको नष्ट कर दिया है। अतः यह देवराज बना हुआ मन्दबुद्धि नीच नहुष अपने ही विनाशके लिये आज आपको लातसे मारेगा॥ २५ ॥
व्युत्क्रान्तधर्मं तमहं धर्षनामर्षितो भृशम्।
अहिर्भवस्वेति रुषा शप्स्ये पापं द्विजद्रुहम् ॥ २६ ॥
आपके प्रति किये गये इस अत्याचारसे अत्यंत अमर्षमें भरकर मैं धर्मका उल्लंघन करनेवाले उस द्विजद्रोही पापीको रोषपूर्वक यह शाप दे दूँगा कि ‘तू सर्प हो जा’॥ २६ ॥
तत एनं सुदुर्बुद्धिं धिक्शब्दाभिहतत्विषम्।
धरण्यां पातयिष्यामि पश्यतस्ते महामुने ॥ २७ ॥
नहुषं पापकर्मणमैश्वर्यबलमोहितम्।
यथा च रोचते तुभ्यं तथा कर्तास्म्यहं मुने ॥ २८ ॥
महामुने! तदनन्तर चारों ओरसे धिक्कारके शब्द सुनकर यह दुर्बुद्धि देवेन्द्र श्रीहीन हो जायगा और मैं ऐश्वर्यबलसे मोहित हुए इस पापाचारी नहुषको आपके देखते-देखते पृथ्वीपर गिरा दूँगा। अथवा मुने! आपको जैसा जँचे वैसा ही करूँगा॥ २७-२८ ॥
एवमुक्तस्तु भृगुणा मैत्रावरुणिरव्ययः।
अगस्त्यः परमप्रीतो बभूव विगतज्वरः ॥ २९ ॥
भृगुके ऐसा कहनेपर अविनाशी मित्रावरुणकुमार अगस्त्यजी अत्यंत प्रसन्न और निश्चिन्त हो गये॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अगस्त्यभृगुसंवादो नाम नवनवतितमोऽध्यायः॥ ९९ ॥