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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 751, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 751

भृगोस्तु पुत्राः सप्तासन् सर्वे तुल्या भृगोर्गुणैः ।
च्यवनो वज्रशीर्षश्च शुचिरौर्वस्तथैव च ॥ १२८ ॥
शुक्रो वरेण्यश्च विभुः सवनश्चेति सप्त ते ।
भार्गवा वारुणाः सर्वे येषां वंशे भवानपि ॥ १२९ ॥
भृगुके सात पुत्र व्यापक हुए, जो उन्हींके समान गुणवान् थे। च्यवन, वज्रशीर्ष, शुचि, और्व, शुक्र, वरेण्य, तथा सवन—ये ही उन सातोंके नाम हैं। सभी भृगुवंशी सामान्यतः वारुण कहलाते हैं। जिनके वंशमें तुम भी उत्पन्न हुए हो ॥ १२८-१२९ ॥
अष्टौ चांगिरसः पुत्रा वारुणास्तेऽप्युदाहृताः ।
बृहस्पतिरुतथ्यश्च पयस्यः शान्तिरेव च ॥ १३० ॥
घोरो विरूपः संवर्तः सुधन्वा चाष्टमः स्मृतः ।
एतेऽष्टौ वह्निजाः सर्वे ज्ञाननिष्ठा निरामयाः ॥ १३१ ॥
अंगिराके आठ पुत्र हैं, वे भी वारुण कहलाते हैं (वरुणके यज्ञमें उत्पन्न होनेसे ही उनकी वारुण संज्ञा हुई है)। उनके नाम इस प्रकार हैं—बृहस्पति, उतथ्य,पयस्य, शान्ति, घोर, विरूप, संवर्त और आठवाँ सुधन्वा। ये आठ अग्निके वंशमें उत्पन्न हुए हैं। अतः आग्नेय कहलाते हैं। वे सब-के-सब ज्ञाननिष्ठ एवं निरामय (रोग-शोकसे रहित) हैं ॥ १३०-१३१ ॥
ब्रह्मणस्तु कवेः पुत्रा वारुणास्तेऽप्युदाहृताः ।
अष्टौ प्रसवजैर्युक्ता गुणैर्ब्रह्मविदः शुभाः ॥ १३२ ॥
ब्रह्माके पुत्र जो कवि हैं, उनके पुत्रोंकी भी वारुण संज्ञा है। वे आठ हैं और सभी पुत्रोचित गुणोंसे सम्पन्न हैं। उन्हें शुभलक्षण एवं ब्रह्मज्ञानी माना गया है ॥ १३२ ॥
कविः काव्यश्च धृष्णुश्च बुद्धिमानुशना तथा ।
भृगुश्च विरजाश्चैव काशी चोग्रश्च धर्मवित् ॥ १३३ ॥
उनके नाम ये हैं—कवि, काव्य, धृष्णु, बुद्धिमान् शुक्राचार्य, भृगु, विरजा, काशी तथा धर्मज्ञ उग्र ॥ १३३ ॥
अष्टौ कविसुता ह्येते सर्वमेभिर्जगत् ततम् ।
प्रजापतय एते हि प्रजाभागैरिह प्रजाः ॥ १३४ ॥
ये आठ कविके पुत्र हैं। इन सबके द्वारा यह सारा जगत् व्याप्त है। ये आठों प्रजापति हैं और प्रजाके गुणोंसे युक्त होनेके कारण प्रजा भी कहे गये हैं ॥ १३४ ॥
एवमङ्गिरसश्चैव कवेश्च प्रसवन्वयैः ।
भृगोश्च भृगुशार्दूल वंशजैः सततं जगत् ॥ १३५ ॥
भृगुश्रेष्ठ! इस प्रकार अंगिरा, कवि और भृगुके वंशजों तथा संतान-परम्पराओंसे सारा जगत् व्याप्त है ॥
वरुणश्चादितो विप्र जग्राह प्रभुरीश्वरः ।
कविं तात भृगुं चापि तस्मात् तौ वारुणौ स्मृतौ ॥ १३६ ॥