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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 746, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 746

प्रभावशाली तात परशुराम! एक समयकी बात है, सबके ईश्वर और महान् देवता भगवान् रुद्र वरुणका स्वरूप धारण करके वरुणके साम्राज्यपर प्रतिष्ठित थे। उस समय उनके यज्ञमें अग्नि आदि सम्पूर्ण देवता और ऋषि पधारे। सम्पूर्ण मूर्तिमान् यज्ञांग, वषट्कार, साकार साम, सहस्रों यजुर्मन्त्र तथा पद और क्रमसे विभूषित ऋग्वेद भी वहाँ उपस्थित हुए ।। ८८-९० ।।
लक्षणानि स्वराः स्तोभा निरुक्तं सुरपङ्क्तयः ।
ओङ्कारश्चावसन्नेत्रे निग्रहप्रग्रहौ तथा ।। ९१ ।।
वेदोंके लक्षण, उदात्त आदि स्वर, स्तोत्र, निरुक्त, सुरपंक्ति, ओंकार तथा यज्ञके नेत्रस्वरूप प्रग्रह और निग्रह भी उस स्थानपर स्थित थे ।। ९१ ।।
वेदाश्च सोपनिषदो विद्या सावित्र्यथापि च ।
भूतं भव्यं भविष्यं च दधार भगवान् शिवः ।। ९२ ।।
वेद, उपनिषद्, विद्या और सावित्री देवी भी वहाँ आयी थीं। भगवान् शिवने भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंको धारण किया था ।। ९२ ।।
संजुहावात्मनाऽऽत्मानं स्वयमेव तदा प्रभो ।
यज्ञं च शोभयामास बहुरूपं पिनाकधृत् ।। ९३ ।।
प्रभो! पिनाकधारी महादेवजीने अनेक रूपवाले उस यज्ञकी शोभा बढ़ायी और उन्होंने स्वयं ही अपने द्वारा अपने आपको आहुति प्रदान की ।। ९३ ।।
द्यौर्नभः पृथिवी खं च तथा चैवैष भूपतिः ।
सर्वविद्येश्वरः श्रीमानेष चापि विभावसुः ।। ९४ ।।
ये भगवान् शिव ही स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी समस्त शून्य प्रदेश, राजा, सम्पूर्ण विद्याओंके अधीश्वर तथा तेजस्वी अग्निरूप हैं ।। ९४ ।।
एष ब्रह्मा शिवो रुद्रो वरुणोऽग्निः प्रजापतिः ।
कीर्त्यते भगवान् देवः सर्वभूतपतिः शिवः ।। ९५ ।।
ये ही भगवान् सर्वभूतपति महादेव ब्रह्मा, शिव, रुद्र, वरुण, अग्नि, प्रजापति तथा कल्याणमय शम्भु आदि नामोंसे पुकारे जाते हैं ।। ९५ ।।
तस्य यज्ञः पशुपतेस्तपः क्रतव एव च ।
दीक्षा दीप्तव्रता देवी दिशश्च सदिगीश्वराः ।। ९६ ।।
देवपत्न्यश्च कन्याश्च देवानां चैव मातरः ।
आजग्मुः सहितास्तत्र तदा भृगुकुलोद्वह ।। ९७ ।।
भृगुकुलभूषण! इस प्रकार भगवान् पशुपतिका वह यज्ञ चलने लगा। उसमें सम्मिलित होनेके लिये तप, क्रतु, उद्दीप्त व्रतवाली दीक्षा देवी, दिक्पालोंसहित दिशाएँ, देवपत्नयाँ, देवकन्याएँ तथा देव-माताएँ भी एक साथ आयी थीं ।। ९६-९७ ।।
यज्ञं पशुपतेः प्रीता वरुणस्य महात्मनः ।