महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपितरं परिपप्रच्छ दृष्टलोकपरावरम् ।
को यज्ञः सर्वयज्ञानां वरिष्ठोऽभ्युपलक्ष्यते ॥ ८ ॥
निष्पाप नरेश! इस विषयमें मैं तुम्हें एक पुराना वृत्तान्त सुना रहा हूँ। एक समयकी बात है, परम बुद्धिमान् शुकदेवजीने नित्यकर्मका अनुष्ठान करके पवित्र एवं शुद्धचित्त होकर अपने पिता—ऋषियोंमें उत्तम श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासको, जो लोकके भूत और भविष्यको प्रत्यक्ष देखनेवाले हैं, प्रणाम करके पूछा—'पिताजी! सम्पूर्ण यज्ञोंमें कौन-सा यज्ञ सबसे श्रेष्ठ देखा जाता है? ।। ६–८ ।।
किं च कृत्वा परं स्थानं प्राप्नुवन्ति मनीषिणः ।
केन देवाः पवित्रेण स्वर्गमश्नन्ति वा विभो ॥ ९ ॥
'प्रभो! मनीषी पुरुष कौन-सा कर्म करके उत्तम स्थानको प्राप्त होते हैं तथा किस पवित्र कार्यके द्वारा देवता स्वर्गलोकका उपभोग करते हैं? ।। ९ ।।
किं च यज्ञस्य यज्ञत्वं क्व च यज्ञः प्रतिष्ठितः ।
देवानामुत्तमं किं च किं च सत्रमितः परम् ॥ १० ॥
'यज्ञका यज्ञत्व क्या है? यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है? देवताओंके लिये कौन-सी वस्तु उत्तम है? इससे श्रेष्ठ यज्ञ क्या है? ।। १० ।।
पवित्राणां पवित्रं च यत् तद् ब्रूहि पितर्मम ।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं व्यासः परमधर्मवित् ।
पुत्रायाकथयत् सर्वं तत्त्वेन भरतर्षभ ॥ ११ ॥
'पिताजी! पवित्रोंमें पवित्र वस्तु क्या है? इन सारी बातोंका मुझसे वर्णन कीजिये।' भरतश्रेष्ठ! पुत्र शुकदेवका यह वचन सुनकर परम धर्मज्ञ व्यासने उससे सब बातें ठीक-ठीक बतायीं ।। ११ ।।
व्यास उवाच
गावः प्रतिष्ठा भूतानां तथा गावः परायणम् ।
गावः पुण्याः पवित्राश्च गोधनं पावनं तथा ॥ १२ ॥
व्यासजी बोले—बेटा! गौएँ सम्पूर्ण भूतोंकी प्रतिष्ठा हैं। गौएँ परम आश्रय हैं। गौएँ पुण्यमयी एवं पवित्र होती हैं तथा गोधन सबको पवित्र करनेवाला है ।।
पूर्वमासन्नशृंगा वै गाव इत्यनुशुश्रुम ।
शृंगार्थे समुपासन्त ताः किल प्रभुमव्ययम् ॥ १३ ॥
हमने सुना है कि गौएँ पहले बिना सींगकी ही थीं। उन्होंने सींगके लिये अविनाशी भगवान् ब्रह्माकी उपासना की ।। १३ ।।
ततो ब्रह्मा तु गाः प्रायमुपविष्टाः समीक्ष्य ह ।
ईप्सितं प्रददौ ताभ्यो गोभ्यः प्रत्येकशः प्रभुः ॥ १४ ॥