महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 663, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतिस्रो रात्रीस्त्वद्भिरुपोष्य भूमौ
तृप्ता गावस्तर्पितेभ्यः प्रदेयाः।
वत्सैः पुष्टैः क्षीरपैः सुप्रचारा-
स्त्र्यहं दत्त्वा गोरसैर्वर्तितव्यम् ॥ ४३ ॥
(गोदानकी विधि इस प्रकार है—) दाता तीन राततक उपवास करके केवल पानीके आधारपर रहे, पृथ्वीपर शयन करे और गौओंको घास-भूसा खिलाकर पूर्ण तृप्त करे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे संतुष्ट करके उन्हें वे गौएँ दे। उन गौओंके साथ दूध पीनेवाले हृष्ट-पुष्ट बछड़े भी होने चाहिये तथा वैसी ही स्फूर्तियुक्त गौएँ भी हों। गोदान करनेके पश्चात् तीन दिनोंतक केवल गोरस पीकर रहना चाहिये ॥ ४३ ॥
दत्त्वा धेनुं सुव्रतां साधुदोहां
कल्याणवत्सामपलायिनीं च।
यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या-
स्तावन्ति वर्षाणि भवन्त्यमुत्र ॥ ४४ ॥
जो गौ सीधी-साधी हो, सुगमतासे अच्छी तरह दूध दुहा लेती हो, जिसका बछड़ा भी सुन्दर हो तथा जो बन्धन तुड़ाकर भागनेवाली न हो, ऐसी गौका दान करनेसे उसके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक दाता परलोकमें सुख भोगता है ॥ ४४ ॥
तथानड्वाहं ब्राह्मणाय प्रदाय
धुर्यं युवानं बलिनं विनीतम्।
हलस्य वोढारमनन्तवीर्यं
प्राप्नोति लोकान् दशधेनुदस्य ॥ ४५ ॥
जो मनुष्य ब्राह्मणको बोझ उठानेमें समर्थ, जवान, बलिष्ठ, विनीत—सीधा-सादा, हल खींचनेवाला और अधिक शक्तिशाली बैल दान करता है, वह दस धेनु दान करनेवालेके लोकोंमें जाता है ॥ ४५ ॥
कान्तारे ब्राह्मणान् गाश्च यः परित्राति कौशिक।
क्षणेन विप्रमुच्येत तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ ४६ ॥
इन्द्र! जो दुर्गम वनमें फँसे हुए ब्राह्मण और गौओंका उद्धार करता है, वह एक ही क्षणमें समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा उसे जिस पुण्यफलकी प्राप्ति होती है, वह भी सुन लो ॥ ४६ ॥
अश्वमेधक्रतोस्तुल्यं फलं भवति शाश्वतम्।
मृत्युकाले सहस्राक्ष यां वृत्तिमनुकाङ्क्षते ॥ ४७ ॥
सहस्राक्ष! उसे अश्वमेध यज्ञके समान अक्षय फल सुलभ होता है। वह मृत्युकालमें जिस स्थितिकी आकांक्षा करता है, उसे भी पा लेता है ॥ ४७ ॥
लोकान् बहुविधान् दिव्यान् यच्चास्य हृदि वर्तते।