महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 646, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोक विद्यमान हैं, जिनमें दुःख-शोकसे रहित पुण्यात्मा भरे पड़े हैं ॥ २९ ॥
न त्वेतासां दानमात्रं प्रशस्तं
पात्रं कालो गोविशेषो विधिश्च ।
ज्ञात्वा देयं विप्र गवान्तरं हि
दुःखं ज्ञातुं पावकादित्यभूतम् ॥ ३० ॥
“विप्रवर! केवल इनका दानमात्र ही प्रशस्त नहीं है; सुपात्र ब्राह्मण, उत्तम समय, विशिष्ट गौ तथा दानकी सर्वोत्तम विधि—इन सब बातोंको जानकर ही गोदान करना चाहिये। गौओंका आपसमें जो तारतम्य है, उसे जानना बहुत कठिन काम है और अग्नि एवं सूर्यके समान तेजस्वी पात्रको पहचानना भी सरल नहीं है ॥ ३० ॥
स्वाध्यायवान् योऽतिमात्रं तपस्वी
वैतानस्थो ब्राह्मणः पात्रमासाम् ।
कृच्छ्रोत्सृष्टाः पोषणाभ्यागताश्च
द्वारैरेतैर्गोविशेषाः प्रशस्ताः ॥ ३१ ॥
“जो ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायसे सम्पन्न, अत्यन्त तपस्वी तथा यज्ञके अनुष्ठानमें लगा हुआ हो, वही इन गौओंके दानका सर्वोत्तम पात्र है। इनके सिवा जो ब्राह्मण कृच्छ्रव्रतसे मुक्त हुए हों और परिवारकी पुष्टिके लिये गोदानके प्रार्थी होकर आये हों, वे भी दानके उत्तम पात्र हैं। इन सुयोग्य पात्रोंको निमित्त बनाकर दानमें दी गयी श्रेष्ठ गौएँ उत्तम मानी गयी हैं ॥ ३१ ॥
तिस्रो रात्र्यस्त्वद्भिरुपोष्य भूमौ
तृप्ता गावस्तर्पितेभ्यः प्रदेयाः ।
वत्सैः प्रीताः सुप्रजाः सोपचारा-
स्त्र्यहं दत्त्वा गोरसैर्वर्तितव्यम् ॥ ३२ ॥
“तीन राततक उपवासपूर्वक केवल जल पीकर धरतीपर शयन करे। तत्पश्चात् खिला-पिलाकर तृप्त की हुई गौओंका भोजन आदिसे संतुष्ट किये हुए ब्राह्मणोंको दान करे। वे गौएँ बछड़ोंके साथ रहकर प्रसन्न हों, सुन्दर बच्चे देनेवाली हों तथा अन्यान्य आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त हों। ऐसी गौओंका दान करके तीन दिनोंतक केवल गोरसका आहार करके रहना चाहिये ॥ ३२ ॥
दत्त्वा धेनुं सुव्रतां कांस्यदोहां
कल्याणवत्सामपलायिनीं च ।
यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या-
स्तावद् वर्षाण्यश्नुते स्वर्गलोकम् ॥ ३३ ॥
“उत्तम शील-स्वभाववाली, भले बछड़ेवाली और भागकर न जानेवाली दुधारू गायका कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करके उस गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक