महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 570, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै ॥ २८ ॥
यथा पत्याश्रयो धर्मः स्त्रीणां लोके सनातनः ।
सदैव सा गतिर्नान्या तथास्माकं द्विजातयः ॥ २९ ॥
जैसे इस संसारमें स्त्रियोंका सनातन धर्म सदा पतिकी सेवापर ही अवलम्बित है, उसी प्रकार ब्राह्मण ही सदैव हमारे आश्रय हैं। हमलोगोंके लिये उनके सिवा दूसरा कोई सहारा नहीं है ॥ २९ ॥
यदि नो ब्राह्मणास्तात संत्यजेयुरपूजिताः ।
पश्यन्तो दारुणं कर्म सततं क्षत्रिये स्थितम् ॥ ३० ॥
अवेदानामयज्ञानामलोकानामवर्तिनाम् ।
कस्तेषां जीवितेनार्थस्त्वां विना ब्राह्मणाश्रयम् ॥ ३१ ॥
तात! यदि ब्राह्मण क्षत्रियोंके द्वारा सम्मानित न हों तथा क्षत्रियमें सदा रहनेवाले निष्ठुर कर्मको देखकर ब्राह्मण भी उनका परित्याग कर दें तो वे क्षत्रिय वेद, यज्ञ, उत्तम लोक और आजीविकासे भी भ्रष्ट हो जायँ। उस दशामें ब्राह्मणोंका आश्रय लेनेवाले तुम्हारे सिवा उन दूसरे क्षत्रियोंके जीवित रहनेका क्या प्रयोजन है? ॥
अत्र ते वर्तयिष्यामि यथा धर्मं सनातनम् ।
राजन्यो ब्राह्मणान् राजन् पुरा परिचचार ह ॥ ३२ ॥
वैश्यो राजन्यमित्येव शूद्रो वैश्यमिति श्रुतिः ।
राजन्! अब मैं तुम्हें सनातन कालका धार्मिक व्यवहार कैसा है, यह बताऊँगा। हमने सुना है पूर्वकालमें क्षत्रिय ब्राह्मणोंकी, वैश्य क्षत्रियोंकी और शूद्र वैश्योंकी सेवा किया करते थे ॥ ३२ १/२ ॥
दूराच्छूद्रेणोपचर्यो ब्राह्मणोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ ३३ ॥
संस्पर्शपरिचर्यस्तु वैश्येन क्षत्रियेण च ।
ब्राह्मण अग्निके समान तेजस्वी हैं; अतः शूद्रको दूरसे ही उनकी सेवा करनी चाहिये। उनके शरीरके स्पर्शपूर्वक सेवा करनेका अधिकार केवल क्षत्रिय और वैश्यको ही है ॥ ३३ १/२ ॥
मृदुभावान् सत्यशीलान् सत्यधर्मानुपालकान् ॥ ३४ ॥
आशीविषानिव क्रुद्धांस्तानूपाचरत द्विजान् ।
ब्राह्मण स्वभावतः कोमल, सत्यवादी और सत्य-धर्मका पालन करनेवाले होते हैं, परंतु जब वे कुपित होते हैं तब विषैले सर्पके समान भयंकर हो जाते हैं। अतः तुम सदा ब्राह्मणोंकी सेवा करते रहो ॥ ३४ १/२ ॥
अपरेषां परेषां च परेभ्यश्चापि ये परे ॥ ३५ ॥
क्षत्रियाणां प्रतपतां तेजसा च बलेन च ।
ब्राह्मणेष्वेव शाम्यन्ति तेजांसि च तपांसि च ॥ ३६ ॥