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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 557, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 557

स्तावात् कालं प्राप्य स गोप्रदानात् ।
पुत्रांश्च पौत्रांश्च कुलं च सर्व-
मासप्तमं तारयते परत्र ॥ २९ ॥
'उस गौके शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतने वर्षोंतक मनुष्य गोदानके पुण्यसे स्वर्गीय सुख भोगता है। इतना ही नहीं, वह गौ उसके पुत्र-पौत्र आदि सात पीढ़ियोंतक समस्त कुलका परलोकमें उद्धार कर देती है ।। २९ ।।

सदक्षिणां काञ्चनचारुशृङ्गीं
कांस्योपदोहां द्रविणोत्तरीयाम् ।
धेनुं तिलानां ददतो द्विजाय
लोका वसूनां सुलभा भवन्ति ॥ ३० ॥
'जो मनुष्य सोनेके सुन्दर सींग बनवाकर और द्रव्यमय उत्तरीय देकर कांस्यमय दुग्धपात्र तथा दक्षिणासहित तिलकी धेनुका ब्राह्मणको दान करता है, उसे वसुओंके लोक सुलभ होते हैं ।। ३० ।।

स्वकर्मभिर्मानवं संनिरुद्धं
तीव्रान्धकारे नरके पतन्तम् ।
महार्णवे नौरिव वायुयुक्ता
दानं गवां तारयते परत्र ॥ ३१ ॥
'जैसे महासागरके बीचमें पड़ी हुई नाव वायुका सहारा पाकर पार पहुँचा देती है, उसी प्रकार अपने कर्मोंसे बँधकर घोर अन्धकारमय नरकमें गिरते हुए मनुष्यको गोदान ही परलोकमें पार लगाता है ।। ३१ ।।

यो ब्रह्मदेयां तु ददाति कन्यां
भूमिप्रदानं च करोति विप्रे ।
ददाति चान्नं विधिवच्च यश्च
स लोकमाप्नोति पुरंदरस्य ॥ ३२ ॥
'जो मनुष्य ब्राह्मविधिसे अपनी कन्याका दान करता है, ब्राह्मणको भूमिदान देता है तथा विधिपूर्वक अन्नका दान करता है, उसे इन्द्रलोककी प्राप्ति होती है ।। ३२ ।।

नैवेशिकं सर्वगुणोपपन्नं
ददाति वै यस्तु नरो द्विजाय ।
स्वाध्यायचारित्र्यगुणान्विताय
तस्यापि लोकाः कुरुषूत्तरेषु ॥ ३३ ॥
'जो मनुष्य स्वाध्यायशील और सदाचारी ब्राह्मणको सर्वगुणसम्पन्न गृह और शय्या आदि गृहस्थीके सामान देता है, उसे उत्तर कुरुदेशमें निवास प्राप्त होता है ।।

धुर्यप्रदानेन गवां तथा वै