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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 531, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 531

उसमें अच्छे-अच्छे सैकड़ों बाण रखे गये हों' ॥ ३१ ॥
ततः स तं तथेत्युक्त्वा कल्पयित्वा महारथम् ।
भार्यां वामे धुरि तदा चात्मानं दक्षिणे तथा ॥ ३२ ॥
तब राजा 'जो आज्ञा' कहकर गये और एक विशाल रथ तैयार करके ले आये। उसमें बायीं ओरका बोझ ढोनेके लिये रानीको लगाकर स्वयं वे दाहिनी ओर जुट गये ॥ ३२ ॥
त्रिदण्डं वज्रसूच्यग्रं प्रतोदं तत्र चादधत् ।
सर्वमेतत् तथा दत्त्वा नृपो वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ३३ ॥
उस रथपर उन्होंने एक ऐसा चाबुक भी रख दिया, जिसमें आगेकी ओर तीन दण्ड थे और जिसका अग्रभाग सूईकी नोंकके समान तीखा था। यह सब सामान प्रस्तुत करके राजाने पूछा— ॥ ३३ ॥
भगवन् क्व रथो यातु ब्रवीतु भृगुनन्दन ।
यत्र वक्ष्यसि विप्रर्षे तत्र यास्यति ते रथः ॥ ३४ ॥
'भगवन्! भृगुनन्दन! बताइये, यह रथ कहाँ जाय? ब्रह्मर्षे! आप जहाँ कहेंगे, वहीं आपका रथ चलेगा' ॥ ३४ ॥
एवमुक्तस्तु भगवान् प्रत्युवाचाथ तं नृपम् ।
इतः प्रभृति यातव्यं पदकं पदकं शनैः ॥ ३५ ॥
श्रमो मम यथा न स्यात् तथा मच्छन्दचारिणौ ।
सुसुखं चैव वोढव्यो जनः सर्वश्च पश्यतु ॥ ३६ ॥
राजाके ऐसा पूछनेपर भगवान् च्यवन मुनिने उनसे कहा—'यहाँसे तुम बहुत धीरे-धीरे एक-एक कदम उठाकर चलो। यह ध्यान रखो कि मुझे कष्ट न होने पाये। तुम दोनोंको मेरी मर्जीके अनुसार चलना होगा। तुमलोग इस प्रकार इस रथको ले चलो जिससे मुझे अधिक आराम मिले और सब लोग देखें ॥ ३५-३६ ॥
नोत्सार्याः पथिकाः केचित् तेभ्यो दास्ये वसु ह्यहम् ।
ब्राह्मणेभ्यश्च ये कामानर्थयिष्यन्ति मां पथि ॥ ३७ ॥
'रास्तेसे किसी राहगीरको हटाना नहीं चाहिये, मैं उन सबको धन दूँगा। मार्गमें जो ब्राह्मण मुझसे जिस वस्तुकी प्रार्थना करेंगे मैं उनको वही वस्तु प्रदान करूँगा ॥ ३७ ॥
सर्वान् दास्याम्यशेषेण धनं रत्नानि चैव हि ।
क्रियतां निखिलेनैतन्मा विचारय पार्थिव ॥ ३८ ॥
'मैं सबको उनकी इच्छाके अनुसार धन और रत्न बाँटूँगा। अतः इन सबके लिये पूरा-पूरा प्रबन्ध कर लो। पृथ्वीनाथ! इसके लिये मनमें कोई विचार न करो' ॥ ३८ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजा भृत्यांस्तथाब्रवीत् ।
यद् यद् ब्रूयान्मुनिस्तत्तत् सर्वं देयमशङ्कितैः ॥ ३९ ॥